मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

आखिर क्या होता है मैच्योर हो जाना?

 आखिर क्या होता है मैच्योर हो जाना?

उम्र का कौन सा पड़ाव ये तय करता है कि अब मैच्योर हो गए हो तुम

क्या लाइफ में सीरियस हो जाना मैच्योर होने की निशानी है

या फिर हंसते-खेलते अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाना मैच्योरिटी है

क्या किसी को शादी के बंधन में बांध देना उसके मैच्योर होने की उम्मीद है

या फिर 20-21 साल की उम्र में पिता का साया सिर से हट जाना और फिर अपनी ख़्वाहिशों व शौक को किनारे कर अपने परिवार का भरण-पोषण करना मैच्योरिटी है।

आखिर क्या है मैच्योर होना?

30 की उम्र पार करना मैच्योर होने का पैमाना है 

या फिर माता-पिता बन जाना खुद ब खुद मैच्योर होने का बहाना है।

दूसरों की बातों को दिल से न लगाना मैच्योर होना है या फिर सालों-साल तक एक ही बात को लेकर अपनों से नाराज़ रहना मैच्योरिटी है।

ज़िन्दगी के अनुभव मैच्योर होना सिखाते हैं या फिर बड़ी-बड़ी बातें करना मैच्योरिटी है।

समय के थपेड़ों से शांत हो जाना मैच्योर होने की निशानी है 

या फिर हर कष्ट को ज़िंदादिली से पार करना मैच्योरिटी है।

आखिर क्या है मैच्योर होना?

कौन तय करता है कि हम मैच्योर हैं

खुद को समझ लेना मैच्योरिटी है या फिर दूसरों की आँखें पढ़ लेना मैच्योर होना है।

हर इंसान खुद की नज़र में मैच्योर होता है, कई मामलों में सामने वाला उसे बचकाना लगता है फिर चाहे उसकी उम्र 40 पार ही क्यों न हो।

हर बात पर दूसरों की बुराई करना मैच्योरिटी है या फिर अपनी बुराई सुनकर भी उसे इग्नोर करना बड़प्पन है। 

अपनों से ही उम्मीद खत्म कर लेना मैच्योर होना है या फिर खुद में ही खुशी तलाश लेना मैच्योरिटी है...

आखिर क्या है मैच्योर होना...

और क्यों इतना ज़रूरी है मैच्योर होना...

क्या है “ख़ुशी”

 ----खुशी----

समुद्र की लहरों को देखकर, जो चेहरे पर खिल आती है, वो है खुशी

गंगा किनारे बैठकर रंग-बिरंगी रौशनी से भरी नौकाओं को देखकर जो मिले, वो है खुशी

गिरते झरने की आवाज़ सुन उसकी ओर लपककर जब पहुँचों तो वो है खुशी

पुरानी यादों को याद कर जो आंखों में आंसू ले आये, वो है खुशी

सर्दियों की धूप में बैठकर गर्म-गर्म चाय की चुस्की लेना है ख़ुशी 

अपनी पसंदीदा मूवी को सालों बाद देखकर, जो नोस्टाल्जिया होता है, वो है खुशी

दोस्तों संग बैठकर पुरानी बातों को फिर से दोहराने में जो मज़ा मिलता है, वो है खुशी

कार के शीशे से सिर निकालकर बालों को लहराने में जो हवा महसूस होती है, वो है खुशी

अपने आज से पलभर के लिए मुँह फेर कर जो थोड़ा अपने लिए जी लो, वो है खुशी

सबकुछ भूलकर जब कभी लिखने बैठती हूँ तो वो है मेरी खुशी...

-------सुपविचार-------

… तो माँ हो तुम

 Farhan’s Poetry From Zindagi Na Milegi Dobara in Toddler's MOM style-

बाल धोकर घंटो बाद अगर सुलझाने बैठती हो,

तो माँ हो तुम...

बालों को संवारने के बजाए अगर पूरा दिन मैसी बन बनाकर घूमती हो,

तो माँ हो तुम...

सुबह की एक कप चाय भी अगर बार-बार गर्म करके पीती हो, तो माँ हो तुम...

3 घंटे की मूवी अगर तीन दिन में खत्म करती हो,

तो माँ हो तुम...

बिंज वॉच का शौक रखने वाली अगर एक वेब सीरीज को हफ्ते भर में खत्म कर पाती हो,

तो माँ हो तुम..

तुम्हारा ही मोबाइल अचानक पराया हो जाये 

तो माँ हो तुम...

मैसेज सीन करके भी अगर घंटों रिप्लाय न कर पाओ तो माँ हो तुम...

यूट्यूब सजेशन राइम्स और कार्टून्स से भर जाए 

तो माँ हो तुम...

रात की नींद अगर बेसिक से लक्ज़री नीड बन जाये

तो माँ हो तुम...

बिना किसी बात के अगर घर में यूँ ही चिड़चिड़ी होकर घूमती हो, तो माँ हो तुम...

इंट्रस्टिंग चीजों से अगर तुम्हारा इंटरेस्ट खत्म हो जाये 

तो माँ हो तुम...

सूसू-पॉटी, खाना और सोना जैसी बेसिक चीज़े सिखाने में अगर तुम्हारा पूरा दिन बीत जाता है,

तो माँ हो तुम...

घूमने-फिरने के नाम से ही अगर डर लगने लगता है 

तो बधाई हो, माँ हो तुम...

ज़ारा और मिंत्रा के बजाय अगर फर्स्ट क्राई से शॉपिंग करने लगी हो, तो माँ हो तुम...

एक टाइम का खाना खिलाने में अगर तुम्हारा एक घंटा गुज़र जाता है, तो माँ हो तुम...

वॉशरूम में समय बिताना अगर तुम्हें मी टाइम लगने लगा है, तो माँ हो तुम...

पूरा दिन अगर सिर्फ घर की सफाई में बीत जाता है, 

तो माँ हो तुम...

खाना खाते-खाते बीच में बच्चे की पॉटी साफ़ रही हो तो माँ हो तुम…

बच्चे का स्कूल शुरू होना अगर तुम्हारे लिए एक खुशनुमा सपना बन गया है, 

तो माँ हो तुम...

अपनी माँ अब तुम्हें पहले से अधिक समझ आने लगी है, तो माँ हो तुम…

कभी कभी माँ कम और रेफ़री ज़्यादा बन चुकी हो तो बधाई हो 2 बच्चों की माँ हो तुम। 

तुम्हारा पेशंस लेवल अगर पहले से कहीं ज्यादा हो गया है, तो माँ हो तुम...

-----सुपविचार-----

बॉलीवुड में नेपोटिज़्म

बॉलीवुड, एक ऐसी दुनिया जो मुंबई शहर यानि माया नगरी में रची-बसी है। अपनी शुरुआत से लेकर अब तक बॉलीवुड ने कई बड़ी फ़िल्में, बड़े स्टार्स और बड़े एक्टर्स दिए हैं। 

यहां स्टार्स और एक्टर्स का ज़िक्र अलग-अलग करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यहीं से जन्म हुआ है एक शब्द का, जिसका नाम है 'नेपोटिज़्म'। कहते हैं डॉक्टर की संतान डॉक्टर, नेता का बेटा नेता और इंजिनियर की संतान इंजिनियर ही बनती है। सेना में पिता के भर्ती होते ही उसका बेटा भी देश के लिए अपनी जान देने के सपने देखने लगता है। मगर जब एक स्टार किड यानि एक्टर का बच्चा भी एक्टर बनने की सोचने लगता है तो यहां आकार लेता है 'नेपोटिज़्म'।

क्यों छिड़ी बॉलीवुड में नेपोटिज़्म पर बहस?

बॉलीवुड के गलियारों में नेपोटिज़्म पर सुगबुगाहट तो कई बार हुई। एक्ट्रेस कंगना रनौत ने खुलकर इस बारे में कई सवाल भी खड़े किये। मगर बॉलीवुड व आम जनता के बीच ये आवाज़ तब बुलंद हुई, जब साल 2020 में एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के अकस्मात निधन की खबर सामने आई।

सुशांत सिंह की मौत ने फैंस के साथ बॉलीवुड के तमाम लोगों को भी सदमें में डाल दिया। लोगों का कहना था कि धर्मा प्रोडक्शन सहित कई बड़े प्रोडक्शन व फिल्मों से बाहर किये जाने की वजह से उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया। इसके बाद नेपोटिज़्म पर एक बड़ी बहस छिड़ गई, जिसमें सबसे बड़ा रोल निभाया सोशल मीडिया ने।

ऐसा कहा जाने लगा कि नेपोटिज़्म की वजह से फिल्म इंडस्ट्री में बाहर के एक्टर्स अपनी जगह नहीं बना पाते और सारे बड़े बैनर या फिर फ़िल्में स्टार किड्स की झोली में चली जाती हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने इस आग को हवा दी और सोशल मीडिया पर नेपोटिज़्म का नाम लेते हुए लोगों ने करण जौहर सहित, आलिया भट्ट, सोनम कपूर, जाह्नवी कपूर, अनन्या पांडे, सारा अली खान और वरुण धवन जैसे कई एक्टर्स पर अपना निशाना साधा। 

इतना ही नहीं इनकी फिल्मों पर बॉयकॉट जैसे हैशटैग भी ट्रेंड करने लगे। नेपोटिज़्म के चपेटे में कई नए स्टार किड्स भी आये, जिनमें सुहाना खान व आर्यन खान, न्यासा देवगन व शनाया कपूर जैसे कई नाम शामिल हुए।

पहले भी रह चुका है नेपोटिज़्म :

कभी सोच कर देखिएगा, बॉलीवुड में स्टार किड्स का फिल्मों में आना क्या पिछले कुछ सालों से शुरू हुआ, जवाब मिलेगा नहीं। 90 के दशक के कई एक्टर्स ने अपने माता-पिता की राह पर चलते हुए एक्टिंग का रास्ता अपनाया। इनमें सनी द्योल, बॉबी द्योल, संजय दत्त, अक्षय खन्ना, अनिल कपूर, सलमान खान, आमिर खान, अजय देवगन, काजोल, करिश्मा कपूर, और रानी मुखर्जी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। मगर इन स्टार्स की एक्टिंग ने दर्शकों का खूब दिल भी जीता। 

हालांकि इनकी मौजूदगी में ही माधुरी दीक्षित, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, अक्षय कुमार, गोविंदा, शाहरुख़ खान, मनोज बाजपाई, ओम पूरी और सुनील शेट्टी जैसे एक्टर्स ने भी बॉलीवुड में अपनी एक खास जगह बनाई।

साल 2000 और उसके बाद भी हृतिक रोशन, सोनम कपूर, ईशा द्योल, करीना कपूर, शाहिद कपूर, अभिषेक बच्चन, रणबीर कपूर, तुषार कपूर जैसे कई स्टार किड्स फिल्मों में आये। कुछ हिट हुए तो कुछ को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। तब भी नेपोटिज़्म के नाम पर इतना हल्ला नहीं मचा जितना कि सोशल मीडिया आने के बाद आज की जेनेरशन पर मचता है।   

तो फिर अब इस पर इतनी बहस क्यों आखिर क्या मायने हैं इस शब्द ‘नेपोटिज़्म’ के। दरअसल, बॉलीवुड में पनपने वाले भाई-भतीजावाद या पक्षपात को इस शब्द से नवाज़ा गया है।

अवार्ड्स में भी नेपोटिज़्म:

समय के साथ बॉलीवुड के ऊपर ऐसे आरोप लगने लगे कि नेपोटिज़्म के चलते सिर्फ फ़िल्में ही नहीं फिल्मों के लिए मिलने वाले अवॉर्ड भी स्टार किड्स में बांटे जाते हैं और जो एक्टर सही मायने में इसका हक़दार होता है, उसे न सिर्फ दरकिनार किया जाता है बल्कि स्टेज शोज़ और चैट शोज़ में उसका मज़ाक भी उड़ाया जाता है। नेपोटिज़्म के चलते ही सुशांत सिंह राजपूत सहित राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, राधिका आप्टे, अमित साध जैसे कई अंडर रेटेड और इंडस्ट्री के बाहर से आये एक्टर्स को फिल्मों में वो जगह नहीं मिलती, जिसके वो हकदार हैं।

नए एक्टर्स पर नेपोटिज़्म का असर:

इस बात में कोई शक नहीं है कि नेपोटिज़्म पर छिड़ी बहस ने कई नए एक्टर्स को इंडस्ट्री में मौका दिया है। मगर इनकी राहें इतनी भी आसान नहीं हुई हैं। हालांकि कार्तिक आर्यन, कृति सेनन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, आयुष्मान खुराना, सिद्धांत चतुर्वेदी, विक्रांत मैसी, तापसी पन्नू, और विजय वर्मा जैसे एक्टर्स इस दौड़ में काफी हद तक आगे भी निकले हैं।

अब दर्शक स्टार से ज्यादा फिल्म के कंटेंट और एक्टर्स पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। इसका ताज़ा उदाहरण आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख़ खान, अक्षय कुमार, दीपिका पादुकोण जैसे स्टार्स की कई फ़िल्में फ्लॉप होना है। अब दर्शक फिल्म में स्टार नहीं बल्कि एक्टर देखना चाहता है। हालांकि जो स्टार अपनी एक्टिंग से दर्शकों का दिल जीत ले उसकी फिल्म दर्शक गले से भी लगाते हैं।

पिता को मौक़ा तो दीजिए

 मैनें अपनी उम्र की बहुत सी माओं को ये कहते सुना है कि बच्चों के मामले में उन्हें अपने पति पर भरोसा नहीं है। वो अपने बच्चे को एक दिन के लिए भी उनके पापा के भरोसे छोड़कर कहीं नहीं जा सकतीं। पता नहीं वो उन्हें ठीक से रखेंगे या नहीं, टाइम पर खाना खिलाएंगे, सुलायेंगे या नहीं आदि। 


उन माओं के लिए मेरा इतना ही मानना है कि आप अपने पति को कुछ ज्यादा ही अंडरअस्टिमेट करती हैं। क्या पता आपकी गैर हाजरी में वो बच्चे का ख्याल आपसे ज्यादा अच्छे से रखें। आखिर वो आज के जमाने के पिता हैं, बच्चों के लिए सब कुछ करते हैं। आपको बस उनके ऊपर ट्रस्ट करना है, जैसे मैं करती हूं। 


मैं ढाई साल के आदी को उसके पापा के पास छोड़कर 2 दिन के लिए जयपुर चली गई थी। ज़रूरत पड़ी तो दोनों बच्चों को एक साथ छोड़ सकती हूं। क्योंकि मुझे पता है, वो बच्चों का ख्याल रख लेंगे। 


अब आप कहेंगे कि मेरे लिए कहना आसान है क्योंकि मेरे पति कर लेते हैं। तो मैं आपसे यही कहूंगी कि आपने तो अपने पति को कभी कुछ करने ही नहीं दिया। आप उन्हें मौका तो दीजिये। बिना मौका दिए ये सोच लिया कि वो बच्चों का ख्याल नहीं रख पाएंगे। 


मुझे याद है मेरी एक दोस्त अपनी 6 साल की बेटी को पति के साथ छोड़कर 2 दिन के लिए काम से कहीं गई थी। बहुत सोच रही थी कि पता नहीं दोनों मेरे बिना कैसे रहेंगे। मगर जब वो वापस गई तो पता चला दोनों ने उसके बिना बहुत अच्छे से मैनेज किया। अब वो बेफिक्र होकर निकल जाती है, अकेले घूमने भी। 


तो आपको बस एक कदम उठाने की ज़रूरत है। विश्वास का कदम। हर पिता बहुत काबिल होता है। अपने बच्चों के लिए जब दिनरात घटकर वो कमा सकता है, तो उन्हें पाल भी सकता है। तो उनके लिये ये सोचना कि वो बच्चों का ख्याल नहीं रख पाएंगे, आपकी एक कोरी कल्पना भर है और कुछ नहीं।


ये ज्ञान नहीं है, प्रैक्टिकल बात है, खुद के अनुभव की। आप भी आज़मा कर देखिएगा।

मुझे होना चाहिए अल्हड़ सी

 मुझे होना चाहिए अल्हड़ सी 

और तुम समझदार से 

मैं करती रहूँ नादानियाँ 

और तुम उन्हें हर बार संभालते से 

मैं शोर नदी का होती 

और तुम शांत सागर से 

मैं बक-बक की दुकान सी 

और तुम मुझे सुनते से 

मैं करती रहती हर सवाल 

और तुम जवाब देते चैट जीपीटी से 

मैं अगर ख़ुद को खोने लगती 

तुम मुझे ढूँढ लाते हर गहराई से 

गर मैं कभी शांत हो जाती

तुम अपनी बाहों में मेरी चुप्पी समेट लेते से 

——-सुपविचार——-

क्यूंकि तुम स्त्री हो…

 मुझे पता है, 

तुम बहुत हिम्मत वाली हो 

मगर अपनी शक्ति का 

इतना भी प्रदर्शन मत करो 

कि लोग तुम्हारे मौन को भी कमज़ोरी समझ लें। 


मुझे पता है, 

तुम हर काम कर सकती हो 

मगर अपने कंधों पर इतना बोझ मत लादो

कि मुस्कान का वज़न भी भारी लगने लगे।


मुझे पता है, 

तुम्हें अपने बच्चों से बहुत प्यार है

मगर इतना भी प्यार मत करो 

कि तुम उन्हें ‘पर’ देना ही भूल जाओ। 


मुझे पता है, 

तुम पहाड़ भी चढ़ सकती हो 

मगर चढ़ते समय 

अपनी रस्सी इतनी कमजोर भी मत रखना 

कि कोई तुम्हें वापस नीचे खींचने की कोशिश करे। 


मुझे पता है, 

तुम डरती नहीं किसी संकट से 

मगर संकट को इतना भी मत बढ़ा लेना 

कि वो ज़िंदगी का हिस्सा बन जाए। 


मुझे पता है, 

तुम स्त्री हो,

मगर अपने वजूद को 

इतना भी हल्का मत बना लेना 

कि ख़ुद अपनी पहचान ही भुला दो। 


क्योंकि हर बार सबको साबित करने की ज़रूरत नहीं होती,

कभी-कभी बस खुद को याद रखना ही काफ़ी होता है। 

——सुपविचार——

शनिवार, 26 सितंबर 2020

मदरहुड नहीं फादरहुड कहिए जनाब...


प्रेगनेंसी एक बेहद खूबसूरत सफर है। अगर आपको लगता है ये जर्नी अकेले एक मां की है तो आप बिलकुल गलत है। इस सफर के दौरान एक पिता भी कई सारे उतार-चढ़ाव और इमोशन्स से होकर गुजरता है। आखिर अपनी पार्टनर की बॉडी में होने वाले छोटे-बड़े बदलावों का साक्षी सबसे पहले और अकेला वही तो होता है। 

प्रेगनेंट लेडी कितनी आसानी से अपने मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन सब हस्बैंड पर उतार देती है... और वो, बिना किसी विरोध के आपको और बच्चे को कोई नुकसान न हो ये सोचकर सब सहते रहते हैं। 

अगर आप घर से दूर अपने पार्टनर के साथ रह रही हैं, तो इस बात को अच्छी तरह समझ भी रही होंगी और महसूस भी कर रही होंगी। साथ ही अपने पार्टनर के योगदान को सराह भी रही होंगी।

उस समय घरवालों से दूर हमारा पार्टनर ही तो हमारी मां-पिता, बहन, फ्रेंड सब होता है। ज़रूरत पड़ने पर वे पति का प्यार... और मां का दुलार भी देते हैं। 

9 महीने के लंबे सफर में होने वाली मां की परेशानियां तो सभी समझ लेते हैं, लेकिन उनके मन मे क्या चल रहा होता है, वो हर दिन कैसा महसूस कर रहे हैं इस बात की तरफ तो किसी का ध्यान जाता भी नहीं। 

वो ऑफिस में मीटिंग्स के समय भी हमारी चिंता कर रहे होते हैं, हमनें मेडिसिन ली या नहीं, खाना और फ्रूट्स समय पर खाये या नहीं बस यही सब सोचते रहते हैं। इस दौरान उन्हें बच्चे के साथ हमारी भी पूरी चिंता सता रही होती है।
 
जिस दिन वो ऑफिस से जल्दी नहीं आ पाते तो गिल्ट से भर जाते हैं, हम किसी दर्द से गुज़र रहे हैं तो एक बच्चे की तरह हमारी केयर करते हैं। ऑफिस से थक कर आने के बाद भी हमारा मनपसंद खाना बनाते हैं। ... और भी बहुत कुछ...

सच में इन 9 महीनों में सिर्फ हम औरतें ही नहीं मर्द भी कई इमोशन्स से होकर गुज़रते हैं। #fatherhoodmatters

ब्रेस्ट फीडिंग- मेरा अनुभव


ब्रेस्ट फीडिंग (स्तनपान) को लेकर बहुत पहले रेडियो पर एक ऐड सुना था, बच्चे को मां का पहला पीला गाढ़ा दूध ही पिलाएं। तब से ही लगता कि मां का दूध तो बच्चा पैदा होते ही आना शुरू हो जाता होगा।

सिज़ेरियन डिलीवरी के बाद जब खुद मां बनी, तो पता चला कि मेरे ब्रेस्ट में मिल्क आ ही नहीं रहा। इसके चलते पहले दिन से बेबी को ऊपर का दूध पिलाना पड़ा। डॉक्टर्स ने बताया कि ऑपरेशन के बाद ये आम है, 2-3 दिन तक मिल्क नहीं बनता।
बीच में कुछ मिल्क बना ज़रूर लेकिन तब बेबी उसे पीना नहीं सीख पा रहा था। 3-4 दिन में वो भी आना बंद हो गया। इस वजह से जब-जब बेबी को पाउडर मिल्क पिलाना पड़ता, खुद पर गुस्सा आता, बिना बात के रोना भी आता... भूख लगनी बंद हो गई, किसी भी काम में मन लगना भी बंद हो गया। नेट पर सर्च किया तो पता चला ये सब 'बेबी ब्लूज़' के लक्षण होते हैं, जो बाद में पोस्टपार्टम डिप्रेशन में बदल जाते हैं। मगर खुद को इसके पीछे का असली कारण पता था।
मिल्क बनने लगे इसके लिए जिसने-जिसने जो बताया, वो किया। जो खा सकते थे खाया, हाल ये कि कोई जहर पीने को बोले तो भी पी लें। ऊपर वाले कि मेहरबानी से समय के साथ 8-10 दिन में दूध बनने लगा और मेरा बेबी ब्रेस्टफीड भी करने लगा। तब कहीं जाकर मैंने राहत की सांस ली।
इस बीच मैंने अपनी बहनों, भाभियों और मां बन चुकी दोस्तों से इस बारे में बात करनी शुरू की। पता चला, मैं अकेली नहीं थी, जो इस समस्या से गुज़र रही थी। इनमें से कई तो अपने बच्चों को ब्रेस्ट फीड करा ही नहीं पाईं। उनके बच्चों ने हमेशा पाउडर मिल्क ही पिया।
मेरी डॉक्टर ने बताया था कि जिस तरह गाय को कभी दूध न बनने की समस्या नहीं होती ठीक उसी तरह मां बनने के बाद एक औरत भी नहीं बोल सकती कि उसे दूध नहीं बन रहा। ये प्रकृति का नियम है। बस हमें हार नहीं माननी है और लगातार कोशिश करनी है। मेरी कोशिश सफल हुई, उम्मीद है सबकी हो जाएगी।

दर्द भी दोस्त बन जाता है

दर्द जब हद से बढ़ जाता है
तो दर्द भी अपना दोस्त बन जाता है। 
मुश्किलें यूं ही नहीं आती ज़िंदगी में 
हर मुश्किल में एक सबक छुपा होता है।
आज खुशियां और ग़म एक साथ मिल बैठे हैं
अपने चेहरे की मासूम मुस्कान से 
वो हर ग़म को भुला देता है। 
वक़्त मुश्किल है तो क्या हुआ, 
वक़्त मुश्किल है तो क्या हुआ। 
उसे फिर देखने की आस ने ही तो हौसला बढ़ा रखा है। 
वो जब देखता है मुझे चमकती आंखों से
मानो हर ग़म को धूल चटा देता है। 
पल भर में उसकी खिलखिलाहट से 
घर का कोना-कोना गूंज जाता है।
दर्द जब हद से बढ़ जाता है
तो दर्द भी अपना दोस्त बन जाता है।

रविवार, 3 मार्च 2019

खुद से रूठा मन

खुद से रूठी रहती हूं मैं
न जाने किस बात पे
आजकल वश नहीं चलता मेरा
मेरे ही जज़्बातों पे
अजीब सी चुभन लिए घूमती हूं
जो लगती है सीधा दिल पे
आजकल खुद पर नाराज़ रहती हूं
न जाने किस बात पे...
बातें एक नहीं हज़ारों चलती हैं
मेरे दिल और दिमाग में
न जाने क्या सोचने लगती हूं
आजकल हर बात पे
खुश दिखना मजबूरी है मेरी
क्योंकि खुशी है उसकी दांव पे
खुद से ही लड़ती रहती हूं मैं
न जाने किस बात पे...
न जाने किस बात पे...

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

प्यार को बेड़ियों में नहीं बांधा जा सकता

कहते हैं अगर आपका प्यार आपसे दूर जाना चाहे तो उसे जाने दो, अगर वो वापस आता है तो आपका है और अगर नहीं आता तो वो आपका कभी था ही नहीं। मैंने भी अपने प्यार को उस समय आज़ाद कर दिया जब उसने मुझसे दूर जाने की बात कही। मगर मैं उसके वापस आने की दुआ नहीं करता क्योंकि सभी को अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने का पूरा हक़ है। मेरा नाम सौरभ है और मैं भोपाल का रहने वाला हूं। ये कहानी मेरे पहले प्यार की है। वो प्यार जो कभी मेरा था ही नहीं। मुझसे दूर जाना उसका फैसला था। मगर उसके फैसले की इज्जत करना मेरा फैसला था।
हमारी मुलाकात 9 साल पहले एक स्कूल में हुई थी। एमबीए के एंट्रेंस टेस्ट के लिए हम दोनों का सेंटर एक ही स्कूल में पड़ा था और इत्तेफ़ाक़ से हमारी सीट्स भी अगल- बगल ही थी। उस दिन रीजनिंग टेस्ट में मैंने उसकी काफी मदद की और यहीं से हुई हमारी दोस्ती की शुरुआत। वो रीजनिंग में कमज़ोर थी इसलिए उसने मुझसे रीजनिंग पढ़ाने की रिक्वेस्ट की, जिसे मैंने मान लिया। अगले दिन से मैंने उसे रीजनिंग में हेल्प करना शुरू कर दिया और उसकी सभी ट्रिक्स उसे सिखाने लगा।
कुछ महीनों बाद हम दोनों ने पुणे के एमबीए कॉलेज का एंट्रेंस टेस्ट दिया और उसमें पास हो गए। ये पहला मौका था जब हम दोनों घर वालों से दूर एक ही शहर में और एक ही कॉलेज में पढ़ रहे थे। उसका हर छोटी- छोटी बात पर मुझपर डिपेंड होना मुझे अच्छा लगने लगा। गर्ल्स हॉस्टल में छुप- छुप कर उससे मिलने जाना, बाकी लड़कों की नजर से उसको बचा कर रखना और उसकी हर ख्वाहिश पूरा करना मुझे बहुत लगता। हां, उसे गुस्सा थोड़ा जल्दी आ जाता था मगर उसके मासूम चेहरे के आगे उसका गुस्सा भी मुझे प्यारा लगता और कई बार अपनी गलती न होने पर भी मैं उससे माफ़ी मांग लेता।
धीरे- धीरे हमें एहसास होने लगा कि हम एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं। कॉलेज के वो दो साल हमारे प्यार में कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। हम दोनों को नौकरी मिलते ही मैंने अपने घर में उसके बारे में सबको बता दिया। मुझे लगा मेरे घर वाले नाराज़ होंगे मगर उम्मीद से उलट जाकर मेरे घर वालों ने हमारे प्यार के लिए हामी भर दी। मगर शादी करने से पहले हमें अपने- अपने करियर में फोकस करने की हिदायत भी दे दी। करियर बनाने की भागदौड़ में कब कई साल निकल गए पता ही नहीं चला। हमारा रिश्ता अब लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप का बन चुका था क्योंकि मैं जॉब के लिए दिल्ली आ गया और वो पुणे में ही जॉब करने लगी।

हमारे शहर की दूरी धीरे- धीरे हमारे रिश्ते की भी दूरी बनने लगी। हम कभी रोज़ मिला करते थे मगर अब साल में सिर्फ दो- तीन बार ही मिलना हो पाता। फ़ोन पर भी अब काम ही हमारी बातें हो पाती और जब होती तो वो किसी न किसी लड़ाई पर जाकर ही ख़त्म होतीं। हम दोनों हमारे रिश्ते के बीच आई इस दूरी को महसूस कर पा रहे थे मगर इस बात को स्वीकारना हम दोनों के लिए आसान नहीं था क्योंकि हम अपने रिश्ते को कई साल दे चुके थे।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब हम अपने प्यार की 9 वीं एनिवर्सरी मनाने के लिए मिले थे। मैं अक्सर उससे मिलने पुणे जाता, ऐसा पहली बार था जब वो मुझसे मिलने दिल्ली आई थी। मैं उससे मिलने की बात पर बहुत खुश था। मगर मुझे क्या पता था ये हमारी आखिरी मुलाक़ात होगी। दरअसल हमारे घर वाले अब शादी करने के लिए बोलने लगे थे। मगर न तो वो पुणे छोड़ने के लिए राज़ी थी और न मैं दिल्ली। मगर इस मुलाक़ात में मुझे उम्मीद थी कि हमारी प्रॉब्लम का कोई न कोई सॉल्यूशन ज़रूर निकलेगा। रेस्टोरेंट पहुंचते ही जैसे एक नई लड़की से मुलाक़ात हुई। ये वो अनन्या नहीं थी जिसे मैं बरसों से जानता था, प्यार करता था। मुझसे इतने समय बाद मिलने पर भी वो ज्यादा खुश नजर नहीं आ रही थी।

मैं उससे बहुत सारी बातें करना चाहता था। मगर उससे पहले उसने अपने मन की बात मेरे सामने रख दी। उसने कहा कि उसके घरवाले अब उसपर शादी का दबाव बना रहे हैं मगर तुम्हारी सैलरी उन्हें ज़िम्मेदारी उठाने के हिसाब से कम लगती है। इसलिए वो मुझे तुमसे शादी करने से रोक रहे हैं। मैंने तुरंत उससे पूछा कि मुझे किसी और की परवाह नहीं हैं, सिर्फ इतना बता दो कि इस बारे में तुम क्या सोचती हो। उसने कहा, "मुझे लगता है मेरे घरवाले सही कह रहे हैं, तुम्हारी सैलेरी वाकई बहुत कम है।" उसके जवाब ने मुझे अंदर तक तोड़ कर रख दिया। ऐसा पहली बार था जब मेरा उसे रोकने या मनाने का मन नहीं हुआ। वो मेरी आंखों के सामने मुझसे दूर जा रही थी मगर मैंने उसे नहीं रोका, उसे जाने दिया अपनी ज़िन्दगी से दूर... बहुत दूर।

उस मुलाक़ात को साल भर बीत चुका है, और उसकी शादी अभी तक कहीं नहीं हुई है। मगर आज भी जब आंखें बंद करके उसके बारे में सोचता हूं तो सिर्फ यही दुआ करता हूं कि वो जहां भी रहे खुश रहे।   

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

वो कच्ची उम्र का पक्का प्यार

यूं तो प्यार के कई नाम हैं। कोई इसे इश्क कहता है तो कोई मोहब्बत, किसी के लिए ये इबादत है तो किसी के लिए उसकी पूरी दुनिया। लोग कहतें है कि प्यार दर्द देता है, उससे दूरी ही भली। मगर मैं कहती हूं कि प्यार तो हर मर्ज की दवा है। जब हमारी जिन्दगी में प्यार होता है उस समय हम सबसे ज्यादा खुश होते है मगर जब वही प्यार हमारे पास नहीं होता तो हमें टूटने का, बिखरने का, दुखी होने का और दर्द का एहसास होता है। फिर हम दर्द देने का इल्जाम प्यार के ऊपर कैसे लगा सकते हैं। प्यार तो बस प्यार होता है।
जो कभी किसी शायर की शायरी बन जाता है तो कभी ठंडी हवा का झोंका बन जाता है। कभी बारिश में भीगी हुई नरम घास बन जाता है तो कभी चाय की गरम प्याली बन जाता है। ये प्यार है, इसे परिभाषित करना इतना भी आसान नहीं, जितना लोग समझते हैं। इसको समझ पाना भी काफी मुश्किल है। खासतौर पर जब वो पहला प्यार हो, पहली बार किसी से नजरें मिली हों, पहली बार किसी के लिए दिल ज़ोरों से धड़का हो, पहली बार जिसको मिलकर बार-बार मिलने का दिल करे। बहुत मासूम होता है ये प्यार, कच्ची उम्र का पक्का प्यार। मेरा नाम अंकिता भार्गव है। ये कहानी मेरी कच्ची उम्र के उस पहले प्यार की है जिसकी खुशबू आज भी मेरी यादों में महक उठती है।
बात उस समय की है जब मैं मसूरी के एक स्कूल में 12वीं क्लास पढ़ाई कर रही थी। वो हमारे फेयरवेल का दिन था जब नवीन ने पहली बार मुझसे खुद आकर बात की और हाय बोला। मेरे लिए ये किसी सपने से काम नहीं था। नवीन मेरा क्लासमेट था और बैकबेंचर भी। मैं पिछले 2 साल से उसे पसंद करती थी। वो हमेशा क्लास में टीचर्स को परेशान करता था। पढ़ाई करते तो शायद ही कभी मैंने उसको देखा हो। मगर उसके बाद भी वो क्लास में हमेशा सेकेंड पोजीशन में आता। क्योंकि फर्स्ट पोजीशन की गद्दी पर तो सिर्फ मेरा ही राज था। मैं एकदम पढ़ाकू किस्म की लड़की थी, चश्मिश बुलाते थे सब क्लास में मुझे। नवीन की शैतानियां, उसकी मस्तीखोरी मुझे हमेशा से ही बहुत पसंद आती। मगर वो तो इन सब से अनजान सिर्फ अपनी धुन में मस्त रहता था। फेयरवेल के दिन जब उसने मुझसे बात की तो मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं। थोड़ा हकलाते हुए मैंने भी उसे हाय कहा और यहींं से शुरू हुई हमारी दोस्ती।
कुछ समय बाद हम दोनों को ही दिल्ली के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया। घर और दोस्तों से दूर सिर्फ नवीन ही था, जिसे मैं जानती थी और जिसपर मैं विश्वास भी कर सकती थी। मगर दिल्ली आते ही न जाने नवीन को क्या हो गया। मैं उससे जितना बात करने की कोशिश करती, वो मुझसे उतना ही ज्यादा दूर भागता। यहां उसका एक नया ग्रुप बन गया था, जिसमें मेरे लिए कोई जगह नहीं थी। उसे शायद मेरे साथ रहने में शर्म महसूस होती थी। क्योंकि मैं अभी भी वही चश्मिश और पढ़ाकू टाइप की लड़की थी। मैं अक्सर दूर से उसे लोगों के साथ हंसी मज़ाक और मस्ती करते देखती मगर मेरे पास आते ही न जाने उसे क्या हो जाता। मैंने सोच लिया था कि इस बारे में नवीन से बात करके ही रहूंगी।
अगली रोज मैंने उसका हाथ पकड़ा और खींच कर उसे कैंटीन की तरफ ले गई। मैंने उससे पुछा कि क्यों कर रहा है वो मेरे साथ ऐसा। क्यों बात नहीं करता, क्यों कटा-कटा सा रहता है मुझसे। इन सवालों के बदले मिले जवाब ने मुझे जैसे तोड़ कर ही रख दिया। उसने मुझसे कहा कि कॉलेज में सभी पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते हैं, मुझे चश्मिश और बहन जी बुलाते है। ऐसे में अगर उसने मुझसे बात की तो कॉलेज की कोई लड़की नवीन को घास नहीं डालेगी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं किससे बात कर रहीं हूं। उस नवीन से जो स्कूल में मासूम शरारतें किया करता था या फिर इस नवीन से मुझसे बात करने में भी शर्म महसूस करता है। मैंने उसी वक़्त फैसला कर लिया कि अब चाहे जो भी हो मैं नवीन से कभी बात नहीं करूंगी।
उस दिन के बाद से ही मैंने नवीन को अवॉयड कर पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया। इंजीनियरिंग के पहले साल का रिजल्ट आने पर पता चला कि मैंने टॉप किया है और नवीन का नाम लिस्ट में सबसे आखिरी था। वो मुझसे अपनी नज़रें ही नहीं मिला पा रहा था। ख़राब रिजल्ट की वजह से जो लड़कियां उसके साथ घूमती थीं, उन्होंने भी उससे बात करना बंद कर दिया था। मगर अब मेरा अपना ग्रुप बन चुका था। कॉलेज के लड़के मुझसे दोस्ती के बहाने नोट्स लिया करते। नवीन अकेला पड़ चुका था। एक दिन मौका देखकर उसने मुझसे बात करनी चाही, मगर इस बार मैंने उसे अवॉयड कर दिया और अपने नए दोस्तों में मस्त हो गई। मन ही मन मुझे उसके लिए बुरा फील हो रहा था, लेकिन जो उसने मेरे साथ किया उसे भूल पाना भी मेरे लिए मुश्किल था। समय बीतता गया और कॉलेज का दूसरा साल भी निकल गया। नवीन का रिजल्ट अब और भी खराब होने लगा था।
एक दिन अचानक उसने आकर मुझसे अपने किए की माफी मांगी। वो बस रोए जा रहा था। उसकी आंखों में पछतावा साफ़ नजर आ रहा था। उसने मुझसे कहा कि दिल्ली आकर वो इस चकाचौंध में भूल गया था कि सुंदरता सादगी में ही होती है और दोस्ती दिल से निभाई जाती है, दिखावे से नहीं। उसे अपनी गलतियों का एहसास था। वो चाहता था कि मैं सबकुछ भूलकर फिर से उसकी दोस्त बन जाऊं। मैं अभी भी मन ही मन उससे प्यार करती थी इसलिए मैंने उसे माफ कर दिया। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर अगले दो साल तक पढ़ाई में बहुत मेहनत की और फाइनल ईयर में अच्छे नंबरों के साथ इंजीनियरिंग पूरी की। जिसके बाद हम दोनों को ही अलग-अलग कंपनी में जाॅब मिल गई।
आज 5 साल बाद हम दोनों अपनी-अपनी जिन्दगी में खुश हैं और बहुत अच्छे दोस्त भी हैं। मैं कभी उससे अपने दिल की बात नहीं कह पाई। मगर तसल्ली इस बात की है कि मुझे दोस्त के रूप में ही सही, लेकिन पुराना नवीन वापस मिल गया था। वो कभी नहीं समझ पाया कि मेरे दिल में उसके लिए क्या है। इस कहानी के जरिए मैं अपने दिल की बात नवीन को बताना चाहती हूं और उससे अपने प्यार का इजहार करना चाहती हूं। इस उम्मीद के साथ कि शायद वो मेरे जज्बातों को समझे और मेरे प्यार को अपनाकर मुझे भी अपना बना ले।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

प्यार में शर्तें और मजबूरी नहीं, सिर्फ प्यार होता है

सोचती हूं जब अपनी ही जिंदगी को शब्दों में उतारने की बारी आती है तो कितनी हिम्मत की जरूरत पड़ती है। कितना कुछ बीता हुआ आंखों के सामने आ जाता है। वो अल्हडपन, वो बेफिक्री, वो दिल में कुछ बनने का जूनून...ऐसी ही तो थी मैं 11 साल पहले तक। आज ऐसा लगता है जैसे इतने सालों का सफर एक लम्हे में सिमट आया है। पहले प्यार को मैंने सिर्फ दूसरों की जुबानी सुना ही था, कभी खुद महसूस नहीं किया था। यही सोचती थी कि पहले कुछ बन जाऊं, अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं उसके बाद प्यार के बारे में सोचूंगी। मम्मी- पापा ने हमेशा जरूरतें पूरी कीं लेकिन शौक खुद की कमाई से ही पूरे किये। मेरा नाम प्रिया है और मैं आपको बताने जा रही हूं अपने पहले प्यार की कहानी...
मैं एक प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी कर रही थी, जब अमर मेरी जिंदगी में आया। वो मेरा ऑफिस कुलीग था। अपने डिपार्टमेंट में 5 लड़कों के बीच एक अकेली लड़की थी मैं, इसलिए सभी बहुत केयर करते थे मेरी। मगर उनकी केयर को कभी मैंने अपने काम के बीच नहीं आने दिया और हमेशा अपना बेस्ट देने की कोशिश की। मेरा और अमर का अक्सर फील्ड वर्क के लिए साथ बाहर जाना होता। धीरे- धीरे काम के बीच हम दोनों में कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला। उसका मेरी केयर करना, मुझपर हक जताना...ये मुझे बहुत अच्छा लगता।
वो मुझे कभी ऑफिस में किसी और लड़के से बात नहीं करने देता, ये कहकर कि उसकी नीयत ठीक नहीं है...यहां तक कि मेरे बेस्ट फ्रेंड से भी मेरा बात करना उसे पसंद नहीं था। मैं भी उसकी बातों में आकर ये सोचती कि ये उसका मेरे लिए प्यार और कन्सर्न है। धीरे- धीरे उसने मुझे बदलना शुरू कर दिया जिसकी शुरुआत हुई मेरे कपड़ों से। वो हमेशा मुझे ऑफिस सूट पहनकर आने को कहता, अगर जीन्स- टॉप पहना है तो साथ में स्टोल जरूरी है, कट स्लीव्स और कैप्री नहीं पहनने हैं, स्किन टाइट टॉप तो बिलकुल नहीं। मेरे लिए ये सब करना बहुत मुश्किल था। मैं एक ओपन माइंडेड फैमिली से थी और अमर एक कन्जर्वेटिव फैमिली से, पर फिर भी मुझे ना जाने क्या हो गया था। विरोध करने के बजाए उस प्यार में मुझे सब सही लगने लगा था। मैं ऐसी बिल्कुल नहीं थी।
कुछ दिनों के बाद उसका ट्रांसफर बनारस हो गया। वहां जाते ही पता नहीं उसे क्या हुआ, उसने मुझसे बात करना कम कर दिया। मैं बेचैन होने लगी थी, हर पल यही सोचती कि वो मुझसे बात क्यों नहीं कर रहा है। किस्मत से एक महीने बाद मेरा ट्रांसफर भी उसी शहर में हो गया। जब मैं वहां पहुंची तो मेरा सामना एक अलग ही अमर से हुआ। उसने मुझसे साफ- साफ कह दिया कि यहां मुझसे बात मत करना क्योंकि सबको लगता है कि मैंने तुम्हारा ट्रांसफर अपने पास करवाया है। उस अनजान शहर में अमर भी मेरे साथ अनजानों जैसा व्यवहार करता। उसके इस व्यवहार ने मुझे तोड़ना शुरू कर दिया।
वो दिन मुझे आज भी याद है जब एक बार ऑफिस में काम करते समय काफी देर हो गई थी। मेरे एक कुलीग ने मुझे आधे रास्ते तक छोड़ देने की रिक्वेस्ट की, जिसे मैंने मान लिया। हम बाइक से जा रहे थे तो रास्ते में हमारा एक्सीडेंट हो गया। मुझे हाथ में फ्रैक्चर हुआ और मेरे कुलीग को भी कुछ चोटें आ गईं। अगले दिन जब अमर को इस बात का पता चला तो मेरा हाल पूछने के बजाए, उसने मुझसे सिर्फ एक सवाल किया, "तुम जब गिरी तो तुम्हें उठाने के लिए उसने तुम्हें छुआ भी होगा"।
अमर के इस सवाल से मैं हैरान रह गई और इस बात ने अन्दर तक तोड़ कर रख दिया। मैंने सोचा कि जिस लड़के के लिए मैंने खुद को ऊपर से नीचे तक बदल डाला, आज वो मुझसे ऐसा सवाल कर रहा है। मैंने भी उसे 'हां' में जवाब दे दिया जिसके बाद उसने मुझसे यह रिश्ता खत्म करने के लिए बोल दिया। मैंने भी सोच लिया था कि अब जिंदगी में कभी उसकी तरफ मुड़ कर नहीं देखूंगी। लगभग 2 साल तक मैं डिप्रेशन में रही, जिसके बारे में मैंने अपने घर में किसी को पता भी नहीं लगने दिया। प्यार के नाम से भी नफरत करने लगी थी मैं। वो मेरा पहला प्यार था, जिसने इतनी बेदर्दी से मेरे प्यार को ठुकरा दिया, जैसे वो मुझसे दूर जाने का कोई बहाना ढूंढ़ रहा हो।
इस बीच मेरे दोस्तों ने मुझे उसकी यादों से बाहर लाने में बहुत मदद की और मैं अपनी नौकरी में बिजी हो गई। मगर मेरे कानों में अब भी अमर के वो आखिरी शब्द हमेशा गूंजते रहते। 3 साल बाद मेरे लिए शादी का एक रिश्ता आया। लड़का दिल्ली में अपनी फैमिली के साथ रहता था। उनका नाम अभिषेक था। एक साल के कोर्टशिप पीरियड के बाद मेरी शादी अभिषेक से हो गई। अपने पिछले रिश्ते की कडुवाहट में अक्सर मैं यही सोचती कि इस बार कुछ हुआ तो मैं अपने पति के खिलाफ भी खड़ी हो जाऊंगी लेकिन खुद को नहीं बदलूंगी।
मगर इस बार मुझे ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी। अभिषेक बहुत ही सुलझे हुए, स्वीट से इंसान हैं। वो मुझे कभी किसी बात के लिए नहीं टोकते। न लड़कों से बात करने पर, न अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर और न दोस्तों के साथ बाहर घूमने जाने पर। वो हमेशा मुझसे कहते हैं कि मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, तुम कभी कुछ गलत नहीं करोगी और मैं तुम्हारी जिंदगी में दखल देने वाला कौन होता हूं। तुम्हें शादी करके लाया हूं, खरीद कर नहीं जो तुम पर हुकुम चलाऊं। अभिषेक के प्यार और विश्वास ने मेरे मन की कडुवाहट को प्यार में बदल दिया। वो अक्सर मेरे साथ घर के काम, खाना बनवाने में मेरी मदद और जरूरत पड़ने पर मुझे एक बच्चे की तरह पैम्पर भी करते हैं।
अभिषेक के साथ से मैंने जाना कि अमर से मेरा कभी प्यार का रिश्ता था ही नहीं। मैंने अमर से सिर्फ प्यार किया था लेकिन प्यार को निभाना मुझे अभिषेक ने सिखाया। उनके साथ मैं बहुत आजाद महसूस करती हूं। आज हमारी शादी को 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है और अभी भी हम दोनों पति- पत्नी कम और लिव- इन- पार्टनर्स की तरह ज्यादा रहते हैं। सही मायने में मेरा पहला प्यार अभिषेक ही हैं। जिन्होंने मुझे कभी बदलने की कोशिश नहीं की बल्कि मेरी हर अच्छी- बुरी आदत के साथ पूरे दिल से मुझे अपनाया। यही तो प्यार होता है न... जहां कोई शर्त और कोई मजबूरी नहीं होती, सिर्फ प्यार होता है।
कहानी कैसी लगी... बताइएगा ज़रूर...





मंगलवार, 3 जुलाई 2018

मेरे यादों का शहर...


मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं 
ठहरी है जहां निगाहें मेरी 
उस समंदर से मिल कर आई हूं 
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...
मिलती थी हर रोज़ खुशियां जहां 

हाथों में डाले हाथ हम गुज़रे थे जहां
उस रेत पर अपने निशान छोड़ कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

तस्वीरों का जहां हिसाब नहीं हुआ
नज़ारों का जहां कभी अंत नहीं हुआ
उन वादियों से मिल कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

शरारतों ने जहां कभी इजाज़त नहीं मांगी
मोहब्बत ने जहां कभी, वक़्त की मोहलत नहीं मांगी
उन गलियों से गुज़र कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

बाहें खोल कर जहां इज़हारे इश्क़ किया
तेरे साथ जहां हर पल को जिया
मुस्कुराहटों से भरी उन शामों से मिल कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

डूबता हैं जहां सूरज नशे में चूर होकर
चांद की रौशनी में खुद को खोकर
शाम की उस चौखट को छू कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

बुधवार, 27 जून 2018

लघु कथा- तुम्हें ज़रूरत नहीं किसी निशानी की


मानव (झिझकते हुए): सुनो, क्या मैं ये अंगूठी उतार दूँ?

अपेक्षा: लेकिन ये तो हमारी सगाई की अंगूठी है, इसे क्यों उतार रहे?

मानव: देखो न, मेरी उंगली में अंगूठी का निशान बन गया है। मैं कुछ दिन के लिए इसे नहीं पहन सकता और वैसे भी मुझे आदत नहीं है ये सब पहनने की, इसीलिए उतार रहा हूँ, तुम संभाल कर रख दो।

अपेक्षा (थोड़ा मुस्कुराते हुए): ह्म्म्म... ये बिछिया देख रहे हो मेरे पैरों में, जब भी जूती या सैंडल पहनने की कोशिश करती हूं... ये गढ़ती है उंगली में, बहुत दर्द होता है। इस वजह से मैंने अपनी पसंद की फुटवियर पहननी ही बंद कर दी। अब सिर्फ वही चप्पल खरीदती हूं जिसमें उंगलियां आगे से खुली रहती हैं...

...अच्छा ये छोड़ो, मेरा मंगलसूत्र देखो, पता है गर्मियों में कई बार पसीना आने से इसकी वजह से मुझे दाने हो जाते हैं। फिर भी मैं इसे उतारती नहीं...

...और ये कांच की चूड़ियां, ये तो सबसे ज्यादा नटखट हैं, काम करते-करते खुद तो टूटती ही हैं, साथ में मेरे हाथों में चोट भी दे जाती है...

...उफ्फ ये कान की बाली, सोते समय बहुत तंग करती है, कभी-कभी तो कान का छेद पका भी देती है।
मुझे भी आदत नहीं थी ये सब रोज़ पहन कर रहने की, फिर भी पहनती हूं।
और गलती से कभी इनमें से कुछ उतार दूं या पहनना भूल जाऊं तो तुम्हारी मां यानी मेरी सासू मां टोक देती हैं और साथ में सुहाग की निशानियों पर दस बातें भी सुना देती हैं...

...पर तुम्हें कोई नहीं टोकेगा और ना बातें सुनाएगा। क्योंकि तुम्हें किसी निशानी की ज़रूरत नहीं....लाओ रिंग मुझे दो, मैं संभाल कर रख देती हूं।

रविवार, 4 मार्च 2018

शादी के बाद भला क्यूँ बदलूं मैं अपना नाम ???



सुप्रिया नितिन सिन्हा... मैंने शादी के बाद फेसबुक पर अपना नाम बदलकर, ये नाम रखने की कभी नहीं सोची. हालाँकि फेसबुक पर मैंने अक्सर ऐसी बहुत सी लड़कियों को देखा है जो शादी होते ही अपने नाम के आगे अपने पति का नाम जोड़ लेती है. शायद अपना प्यार जताने का ये उनका एक तरीका हो या फिर अपने पति का नाम अपने नाम के आगे जोड़ कर उन्हें शान महसूस होती हो. या फिर वो इस वर्चुअल दुनिया को यह बताना चाहती हों की 'देख लो अब मेरी शादी हो गयी है, अब नो चांस'... खैर, एक तरह से ये उनकी पसंद का मामला है, वो जो भी चाहे करें अपने नाम के साथ.
 
मुझे आज भी याद है, स्कूल में मेरी एक सहेली ने बताया था की उसके यहाँ एक रिवाज़ है. जिसमें शादी होते ही ससुराल वाले लड़की का दूसरा नाम रख देते है और आगे की पूरी ज़िन्दगी वो उसी नाम से जानी जाती है. उस समय भी मझे ये बात कुछ ख़ास समझ नहीं आई थी. मैं सोचती थी कि आखिर जब माता-पिता ने अपनी बेटी का एक प्यारा सा नाम रख दिया है तो उसे बदलना क्यों? कहीं न कहीं उसी समय मेरे बाल मन ने यह तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपना नाम कभी भी नहीं बदलूंगी. 

दादी-नानी से अक्सर ये कहते सुना है कि लड़कियां पहले अपने पिता के नाम से जानी जाती है, शादी के बाद अपने पति के नाम से और बच्चे होने के बाद उनके नाम से. कुल मिलकर बचपन में ही हमें ये बात घुट्टी बना कर पिला दी जाती है कि हमारा अपना कोई अस्तित्व नहीं होता. मगर अब समय बदल गया है. अब हर दूसरी लड़की बड़े होने पर सफ़ेद घोड़े पर सवार राजकुमार के सपने नहीं देखती बल्कि अपने करियर को एक बेहतर दिशा में ले जाने के सपने देखती है. आज हर लड़की का सपना सिर्फ शादी करके घर बसना नहीं होता. बल्कि उसके साथ-साथ अपने करियर को एक नई उड़ान देना भी होता है. वो इतनी सक्षम होती है कि अपना नाम खुद बना सके और खुद अपनी पहचान कायम रख सके.

तो फिर क्यों अपना नाम बदलें. शादी से पहले हमने जिस नाम से अपनी पहचान बनाई है उसी नाम को क्यूँ हम शादी के बाद बदल दें. मुझे मेरा नाम बहुत पसंद है और मैं उसे फेसबुक या फिर अपने किसी डाक्यूमेंट्स में नहीं बदलना चाहती. ऐसा नहीं है कि मुझे दुनिया के बनाये हुए उसूलों से उल्टा चलने की आदत है. बस मेरी सोच इस मामले में अलग है.

लोग मुझे पहले भी सुप्रिया श्रीवास्तव के नाम से ही जानते थे और मैं चाहती हूँ की मेरी शादी के बाद भी वो मुझे इसी नाम से जाने न की किसी और नाम से. मैं खुशकिस्मत हूँ कि मेरे इस फैसले में मेरे पति ने मेरा पूरा साथ दिया. वो खुद नहीं चाहते कि मैं उनके नाम से जानी जाऊं बल्कि वो मेरी अपनी एक इंडिविजुअल पहचान बनते देखना चाहते है. वो बहुत खुश होते है जब कोई उनसे मेरे ब्लॉग की या मेरी राइटिंग की तारीफ़ करता है. आखिर मेरे हर ब्लॉग के सबसे बड़े क्रिटिक भी तो वही हैं.

ये मेरा नाम है. वो नाम जिससे बचपन में मुझे स्कूल में एडमिशन मिला. वो नाम जिससे मैंने अपना कॉलेज पूरा किया, वो नाम जो मेरी डिग्रियों से लेकर मेरे आधार कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस तक में है, वो नाम जिसे मैंने अपनी पहली नौकरी में भरा था. फेसबुक हो, जीमेल हो, लिंक्ड इन हो, मेरा ब्लॉग हो या फिर कुछ और. मैं हर जगह अपने नाम का इस्तेमाल करना पसंद करती हूँ. आखिर मेरा नाम ही तो मेरी पहचान है तो फिर शादी के बाद भला क्यूँ बदलूं मैं अपना नाम ???    

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

बारिश की बूंदे और मेरी शरारती कलम




बारिश से भीगा हुआ एक कोना, जिसमें बारिश की बूंदे मानो अभी-अभी बरस कर गई हों. हवा भी मानो यूँ ही गुज़र कर निकली हो वहां से. सामने एक हरा-भरा सा बगीचा हो. जिसकी घास अभी भी बारिश का नरम एहसास कराती हो. हाथ में एक गरमा-गरम चाय का प्याला हो. साथ में सफेद कागज़ों से भरी हुई एक डायरी हो और नीले रंग की स्याही में डूबी हुई मेरी शरारती कलम. कुछ भी बेहिसाब, सोच की गहराइयों से शब्दों में डूबा हुआ लिखने के लिए भला इससे अच्छा समां और क्या हो सकता है. 
 
वो अक्सर मुझसे सवाल करते हैं तुम कैसे इतनी आसानी से अपने मन की सारी बातें लिखकर शब्दों में बयां कर देती हो? मैं कहती हूँ, ठीक उसी तरह जिस तरह आप अपने मन की सारी बातें मुझसे बोलकर बयां कर देते हो. मेरे लब शायद मेरे प्रेम, मेरे एहसासों, मेरे जज्बातों व मेरी भावनाओं से मेल न खा पाते हो. पर जब भी लिखने बैठती हूँ तब वो एक-एक शब्द मेरे दिल का हाल बयां कर देता है. मेरी कलम जैसे मेरे बारे में सब कुछ जानती है. मुझे उसको कुछ बताना भी नहीं पड़ता और वो...बस लिखती चली जाती है. यही तो दोस्ती है हमारी. मैं उससे चाहे जितने दिन बाद मिलूं, वो मुझसे कभी नाराज़ नहीं होती. वो हमेशा मेरे दिल की बात समझकर उसे कागज़ पर उतार देती है. 

वो मेरे अकेलेपन की साथी है. उससे मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है. उसे मैं तब से जानती हूँ जबसे मैंने होश संभाला है और जबसे मैंने शब्दों से खेलना सीखा है. जब कोई साथ नहीं होता तब बस एक वही तो है जो मेरे साथ होती है. वो न जाने मेरे कितने ही रहस्यों की साक्षी है और न जाने मेरी ज़िन्दगी के कितने पन्नों को अपनी स्याही से भर चुकी है. वो मुझसे कभी शब्दों का हिसाब नहीं मांगती. वो तो बस मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सोच के उस सागर में ले जाती है जो बहुत विशाल है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, जो हर बंधन से परे है. वो मेरी हर सोच को कागज़ पर उतार कर उसे अमर कर देती है और मेरे अशांत मन को भी सांत्वना देकर शांत कर देती है. 

उसे बारिश से बहुत प्यार है. वो जब भी बारिश को देखती है तो मानो कागज़ पर थिरकने को मचल उठती है. अपनी स्याही के हर रंग से वो कागज़ को जैसे डुबो देना चाहती है. बारिश देखते ही उसकी शरारत जैसे बढ़ जाती है. वो बारिश की बूंदों से मानो खेलना चाहती हो. उसकी यही शरारत मुझे उसकी ओर खींचती है. और मैं निकल पड़ती हूँ उसके साथ एक नए सफ़र पर. कुछ नई यादों को शब्दों में पिरोने तो कुछ पुरानी यादों के पन्नों को फिर से पलटने. मैं खो जाती हूँ उसके साथ अपनी ही दुनिया मैं. जहाँ... सिर्फ मैं होती हूँ और साथ होती है, मेरी शरारती कलम.