शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

आज फिर जीने का दिल कर रहा है...


आज फिर मुस्कुराने का दिल कर रहा है
आज फिर बहक जाने को मन कर रहा है
खोए थे जिस अंधेरे में हम
आज फिर उसे रोशन करने का दिल कर रहा है
सूख चुकी थी जो कलियाँ मन की 
फिर से उन्हें बारिश में भिगोने को दिल मचल रहा है
रुक हुई ज़िन्दगी को
आज फिर उसे हवा में बहा ले जाने का दिल कर रहा है
दूर थी जो खुशियाँ खुद से
आज फिर उन्हें पाने का दिल कर रहा है
फिर से जीने का दिल कर रहा है
आज फिर मुस्कुराने का दिल कर रहा है...

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

शाम...

ज़िन्दगी में रिश्तों को उलझते हुए देखा है मैंने
हर मोड़ पर बिना बात के झगड़ते हुए देखा है मैंने
एक लम्हें में जिया है सदियों का सफ़र
चंचल मन को हर पल उदास होते देखा है मैंने
प्रेम की एक पाती में प्यार को सिमटते हुए
आँखों से छलकते आसुंओं में
रिश्तों को डूबते हुए देखा है मैंने

उम्र बीत जाती है सच्चे प्यार के इंतज़ार में
किसी को किसी के प्यार में टूट कर बिखरते हुए देखा है मैंने
यूँ तो हर जाम यादों के पिया करते थे
प्यार को कई बार सिसकते हुए देखा है मैंने
एक वो शाम थी जब आंसुओं से दोस्ती हुआ करती थी
एक ये शाम है जब आंसुओं से भी नाता टूटते देखा है मैंने…

शुक्रवार, 28 जून 2013

प्यार- मेरी नज़र से...

प्यार में दो तरह की Relationships होती है-
1 - Close Relationship
2 - Long Distance Relationship

Close Relationship में जहाँ लड़का और लड़की हर वक़्त साथ रहते हैं, साथ घूमते हैं, मॉल, बाज़ार, सड़क जैसी सार्वजनिक जगह में एक दुसरे का हाथ इतनी कस के पकड़े रहते हैं मानो जन्म से ही हाथों में फेविकोल लगा  दिया गया हो, खैर, ये प्राय: थिएटर की कोने वाली सीट में, गार्डन में पेड़ के नीचे या झाड़ियों के पीछे भी पाए जाते हैं। और हाँ यहाँ मैंने लिव-इन रिलेशनशिप वालो का ज़िक्र इसलिए नहीं किया क्योंकि वो भी काफ़ी हद तक इनसे ही मिलते जुलते हैं।

वहीँ इसके उलट बेचारे Long Distance Relationship वाले हर समय फ़ोन या इन्टरनेट के साथ ही पाये जाते हैं। क्योंकि यही उनका पहला और आखरी सहारा होता है जिसके ज़रिये वो एक दूसरे से बात कर पाते है या एक दूसरे को देख पाते हैं। इनके मन में हर वक़्त कुछ न कुछ डर समाया रहता है, ये insecurity से भरे रहते हैं, कहीं मेरे पार्टनर का किसी और के साथ चक्कर तो नहीं, कहीं वो किसी और के साथ तो नहीं घूम रहा/रही, कहीं मेरे फ़ोन रखने के बाद वो किसी और से तो बात नहीं कर रहा/रही....ऐसा तो नहीं की मेरे अलावा वो किसी और से भी चैट करने में busy हो.....ऒहहह....कितना कुछ है इनके पास सोचने के लिए।

Close Relationship वालों के पास सोचने के लिये कुछ ख़ास होता ही नहीं। इसमें कई फ़ायदे हैं आप कभी भी अपने पार्टनर का फ़ोन उठा के कॉल डिटेल या inbox चेक कर सकते हैं, उसकी बेस्ट फ्रेंड को पटा के उसके बारे में हर ख़बर रख़ सकते हैं, वो जहाँ भी जाये वहां सरप्राइज देने के बहाने पहुंच सकते हैं, हर वक़्त उसके साथ फ़ोन पर लगे रह सकते हैं क्योंकि लोकल कॉल पर तो अम्बानी भी फ़िदा हैं, पार्टनर को उनसे ही बात करने देते है जिन्हें वो खुद जानते हों, कॉलेज, ऑफिस जो भी हो ख़ुद छोड़ने जाते है और ख़ुद लेने भी आते हैं। पार्टनर के सुबह जागने से लेकर रात को सोने तक की हर छोटी से बड़ी ख़बर रखते हैं, Insecurity नाम की चिड़िया तो इनके आस-पास भी नहीं उड़ती। (शायद)

वैसे फ़ायदे तो Long Distance Relationship में भी कम नहीं हैं। उसमें पार्टनर अपका फ़ोन चेक तो क्या छू भी नहीं सकता, किसी से भी बात करो पार्टनर देखने तो आयेगा नहीं, फ़ोन पर भी हर समय नहीं रहा जा सकता कॉल STD जो है, जैसे चाहो वैसे रहो टोकने के लिए पार्टनर तो है ही नहीं। मूवी देखते वक़्त ये भी बोल दो की घर में गाने सुन रहे तब भी उसे मानना पड़ेगा, क्योंकि वो बेचारी/बेचारा आपको सरप्राइज देने अचानक पहुँच भी तो नहीं सकती/सकता।

रिलेशनशिप जो भी हो सबसे ज़रूरी है एक-दूसरे के लिए विश्वास। हमें अपनी सोच कभी भी दूसरे के ऊपर थोपनी नहीं चाहिए, शक नाम की बिमारी को कभी भी बीच की दीवार नहीं बनने देना चाहिए, दूर हो या पास ज़रूरी है एक दूसरे के साथ होना, एक दूसरे के लिए निश्छल, निस्वार्थ प्यार होना, शिकवे-शिकायत करने के लिए पूरी ज़िन्दगी पड़ी है, लेकिन अगर साथ है तो प्यार करने के लिए एक ज़िन्दगी भी कम पड़ जाती है।









मंगलवार, 18 जून 2013

रूठ गया बचपन...

उफ्फ...ये पढ़ाई कब ख़त्म होगी??? किसने बना दी ये किताबें??? कब ख़त्म होंगे हर साल आने वाले ये exams??? अपने आप से ये सवाल ना जाने कितनी बार किया मैंने। हमेशा से बड़ों को देखकर लगता था की उनकी ज़िन्दगी सबसे अच्छी होती है....ना कोई डाँटने वाला, ना कोई पढ़ाई के लिए फ़ोर्स करने वाला, ना तो उन्हें मैथ्स की equation solve करनी पड़ती है, ना ही exams देने होते हैं और ना ही आने वाले Results की चिंता होती है।
यही ज़िन्दगी तो चाहिये थी मुझे...

मगर आज जब मैं वही ज़िन्दगी जी रही हूँ तो क्यों सब कुछ होने के बाद भी लगता है जैसे कुछ अधूरा है... वो स्कूल कैंटीन के 2 रुपए के 5 गोलगप्पे... दोस्तों के साथ घंटों बैठकर मारे हुए गप्पे...क्लास बंक करके डांस प्रैक्टिस में लगाये हुए ठुमके...रेनी डे पर स्कूल का गोला... वो गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार... वो कहो ना प्यार है देखने के बाद ह्रितिक के लिए प्यार...
सब कुछ आज एक सपने जैसा लगता है...

हर बात से बेफ़िक्र तब कहाँ पता था की हर कदम पर देने वाले इम्तिहान से तो हर साल आने वाले इम्तिहान ज्यादा अच्छे लगेंगे। तब ये तो पता था कि जो भी हो पास तो हो ही जाना है...पर आज ज़िन्दगी के किस इम्तिहान में फ़ेल हुए और किसमें पास यह पता लगाते-लगाते ही पूरी ज़िन्दगी बीत जाती है। तब कहाँ पता था बचपन की कीमत क्या होती है...दोस्तों के साथ समय गुज़ारने का लुत्फ़ क्या होता है...

इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में हमे हमारे अपनों के लिए ही वक़्त निकलता पड़ता है...दोस्तों से मिलने के लिए भी उनके वक़्त का इंतज़ार करना पड़ता है...कभी कभी तो लगता है, क्यों हमारा बचपन इतनी जल्दी हमसे रूठ गया...क्यों गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया...क्यों हम इतनी जल्दी बड़े हो गये??? क्यों ???
अपने बचपन से बस यही कहना चाहती हूँ...
रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम... ये ना सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम…






बुधवार, 10 अप्रैल 2013

''ओह माई गॉड''

पिछले दिनों बहुत कुछ हुआ, कहीं आसाराम बापू ने भगवान को अपना यार बना लिया तो राहुल गाँधी ने देश को मधुमक्खी का छत्ता कह डाला, जहाँ रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर साहब ने बढ़ती महंगाई का दोष गाँव वालों के अच्छे खाने पर मढ़ दिया, वहीँ मोदी महिलाओं की तारीफों के पुल बांधने में लगे थे, इन सबके बीच हर मुद्दे को ठेंगा दिखाते हुए IPL अपनी ही धुन में मग्न है।

लिखने के लिए इतना कुछ है कि पहले किस पर लिखूँ यही समझ नहीं आ रहा। जिस तरह हर काम की शुरुआत भगवान के नाम से करनी चाहिए उसी तरह मैं भी पहले उन्हीं पर आती हूँ। कुछ समय पहले आसाराम ने बयान दिया था कि ''भगवान तो मेरा यार है मैं जब चाहूँ उससे कह कर बारिश करवा सकता हूँ'' बापू जी महाराष्ट्र को पानी की ज़रूरत है अपनी ज़ुबान चलाने के बजाये वहाँ अपने वर्षा रूपी बाण क्यों नहीं चलते आप।

मेरे एक जानने वाले हैं जिनके घर पर आसाराम के नाम की चालीसा पढ़ी जाती है वो भी जीते-जागते आसाराम की तस्वीर पर माला चढ़ा कर, और तस्वीर भी कैसी साक्षात् कृष्णा के अवतार में, कुछ ऐसी----
अब इस तस्वीर को देखकर ये समझना मुश्किल है की आसाराम, भगवान को अपना यार मानते हैं या ख़ुद को साक्षात् भगवान।

काला पर्स तो याद ही होगा न, जिसे हर रोज़ दोपहर 3 बजे घर की महिलाओं के साथ आदमी भी लेकर कर TV के सामने बैठ जाया करते थे इस उम्मीद में कि निर्मल बाबा के दर्शन भर से उनका पर्स रुपयों से भर जायेगा। बाज़ारों में रातोंरात काले पर्स की मांग बढ़ गयी थी, सब निर्मल बाबा की कृपा से। उनका तो अपना एक दानपत्र भी हुआ करता था जिसमे धनराशि जमा करने  लिए बकायदा टीवी पर पता भी दिया जाता था। जिसके सहारे उन्होंने कई सौ करोड़ की संपत्ति भी बना ली। भक्तों द्वारा दी गई धनराशि का उपयोग कहाँ किया जाता था इसका आज तक कोई ब्यौरा सामने नहीं आया हैं।

हाल ही में एक फिल्म आई थी, ''ओह माई गॉड'' जिसमें इन सभी मुद्दों को उठाकर लोगों की आँखों पर पड़ी पट्टी को हटाने की कोशिश की गई। फ़िल्म काबिले तारीफ़ थी, पर अपने उद्देश्य में कहा तक सफल हुई यह तो फ़िल्म देखने वालों पर ही निर्भर करता है। यहाँ तो मैंने मात्र दो नाम लिये है, समाज में ऐसे और कई साधू-संत और बाबाओं की भीड़ है जो आये दिन लोगों की भक्ति और श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करते है। हम जानते है वो भगवान नहीं है फिर भी आस्था में अंधे होकर हम इनकी शरण में चले जाते है, और ये भगवान के नाम पर धंधा चलाते हुए अपना बैंक बैलेंस बनाते है।
 






मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अगर फोटोग्राफर चाहता तो बच्ची कुत्तों का भोजन ना बनती

हाल ही एक अख़बार में ख़बर छपी थी, ''फेंकी गई नवजात बच्ची को नोंचकर खा गये कुत्ते''. विचलित कर देने वाली तस्वीरों से अख़बार का पहला पन्ना पटा पड़ा था।  तस्वीरें देखकर हर किसी का दिल दहल जाये। नीचे इन तस्वीरों को खींचने वाले फोटोग्राफर का नाम भी छपा था। ख़बर लिखने वाले ने वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों और आमजनों की संवेदनहीनता को खूब कोसा। एक अस्पताल के सामने नवजात बच्ची को फेंक दिया गया। वहाँ से गुज़रने वाले किसी भी शख्स ने उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। फोटोग्राफर ने हर प्रकार से उसकी तस्वीरें ली। सड़क पर उसका पड़े रहने से लेकर कुत्तों का उसे नोंचकर खाने तक की तस्वीरें।
पर सवाल यह है की तस्वीरें खींचकर दूसरों को कोसने वाले फोटोग्राफर की इंसानियत उस समय कहाँ चली गयी थी, जब वह सड़क किनारे पड़ी थी। वह चाहता तो बच्ची को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकता था, जिससे शायद नवजात बच्ची कुत्तों का भोजन बनने से बच जाती। लेकिन यहाँ उसकी प्राथमिकता तस्वीरें खींचकर पुलिस और प्रशासन की लापरवाही दिखाना था ना कि उस मरती हुई बच्ची की जान बचाना। क्या होता अगर वह तस्वीर ना लेता, बस इतना कि अगले दिन यह ख़बर ना छपती, लेकिन अपनों द्वारा ठुकराई गयी वह नन्ही जान तो बच जाती। यदि फोटोग्राफर चाहता तो एक ज़िम्मेदार नागरिक का फ़र्ज़ निभाते हुए पुलिस में इसके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज़ करवा सकता था, लेकिन वह भी मात्र एक मूकदर्शक बन तस्वीरें ही लेता रहा।
क्या पत्रकारों का फ़र्ज़ सिर्फ़ ख़बर छापने तक ही सीमित है। बात जब इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने की आती है तो क्यों ये दूसरों को कोसते नज़र आते है। ज़रुरत पड़ने पर ख़ुद आगे आकर ग़लत होने से रोकते क्यों नहीं??? मेरी उस फोटोग्राफर या अख़बार से जुड़े किसी भी शख्स से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। पर तस्वीर पे नज़र पड़ते ही पहली बात मन में यही आई कि वह चाहता तो बच्ची को कुत्तों के मुहं में जाने से बचा सकता था। वह चाहता तो बच्ची इस दुनिया में साँसे ले सकती थी। वह चाहता तो उसकी जान बच सकती थी। अगर वह चाहता तो…. 

रविवार, 24 मार्च 2013

मजनुओं का जमावड़ा

मेरे कुछ दोस्त है बिलकुल मजनूं टाइप। ज़िन्दगी में एक लड़की, जिससे कभी प्यार हुआ था और फ़िर ब्रेकअप भी हो गया उसे लेकर आज तक रो रहे हैं। कुछ इतने महान आशिक़ है की उम्मीद लगाये बैठे हैं, उनका प्यार लौट कर ज़रूर आयेगा। कुछ ने तो कभी भी शादी ना करने का एलान भी कर दिया। उन्हें समझाना तो जैसे पत्थर पे अपना सिर दे मारना। इस प्यार ने न जाने कितने मजनुओं को शायर बना दिया। एक दोस्त ने तो मुझसे ये तक बोल दिया कि मजनुओं को समझाने के लिए पहले खुद मजनूं बनना पड़ता है।

उफ्फ्फ इतना बड़ा डायलाग, यार ज़िन्दगी ना तो लैला मजनूं की फ़िल्म है और न ही एकता कपूर का कोई सीरियल जहाँ प्यार बार-बार जाकर फ़िर लौटकर आ जाये। यहाँ एक बार जो जाता है फिर कभी लौट कर नहीं आता। सपनों से बहार आओ और देखो इसके परे भी दुनिया है। जब किसी के ज़िन्दगी से चले जाने पर ये हवायें नहीं रूकती, बारिश नहीं सूखती, वक़्त नहीं रुकता तो हमारी ज़िन्दगी कैसे रुक सकती है। लोगों को ये साबित कर देने के चक्कर में की हम ही सबसे बड़े मजनूं है, अपनी आने वाली खुशियों को दाँव पर लगा देना काहे की समझदारी है।
बेचारे माँ-बाप ये सोच के खुश होते है की लड़का हमारे लिए एक सुन्दर, सुशील बहू लेकर आएगा, उन्हें क्या पता उनका होनहार लड़का तो कुछ और ही प्लानिंग कर के बैठा है। एक लड़की के वियोग में जो अब कभी उसकी  नहीं  होगी, उसके लिए शादी न करने की प्लानिंग। वो ताउम्र शादी नहीं करना चाहता सिर्फ़ लड़की को ये साबित करने के लिए कि देखो, हम ही तुम्हारे सच्चे आशिक़, सच्चे मजनूं है, जितना प्यार हम तुम्हें कर सकते हैं कोई दूसरा नहीं कर सकता, इतना की तुम्हारे लिए किसी और लड़की से शादी तक नहीं की। बेवफ़ा तो तुम थी, जो किसी और से शादी करके अपना घर भी बसा लिया।
कुछ मजनुओं के दिल को इस दूरी में भी सुकून मिलता है। बस चले तो सारी उम्र ऐसे ही गुज़र दें, क्यूंकि ताउम्र तो अकेले नहीं गुज़ारी जा सकती इसीलिए दिल को किनारे रख दिमाग से काम लेते हुए शादी कर लेगे, और दिल ने चाहा तो कुछ समय बाद पत्नी से प्यार भी हो जायेगा। पर पहले प्यार की जगह तो पत्नी भी नहीं ले सकती लेकिन समय के साथ वो भी दिल में जगह बना ही लेगी। बेचारी बीवी उसे तो पता भी नहीं कि उसे किस गुनाह की सज़ा मिलने वाली है। 
मैं ये नहीं कह रही की वो सब ग़लत है, हर किसी को हक है अपनी ज़िन्दगी के फ़ैसले लेने का, उसे अपने मुताबिक जीने का। पर हम ये क्यों भूल जाते हैं की हमारी ज़िन्दगी सिर्फ हमारी नहीं होती। उससे और भी बहुत लोग जुड़े होते हैं। हमारे माता-पिता, परिवार सब हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा होते हैं। उनकी उम्मीदें उनके सपने हमसे जुड़े होते हैं,  जिनको मजनूं बन के झुठलाया नहीं जा सकता।