हाल ही एक अख़बार में ख़बर छपी थी, ''फेंकी गई नवजात बच्ची को नोंचकर खा गये कुत्ते''. विचलित कर देने वाली तस्वीरों से अख़बार का पहला पन्ना पटा पड़ा था। तस्वीरें देखकर हर किसी का दिल दहल जाये। नीचे इन तस्वीरों को खींचने वाले फोटोग्राफर का नाम भी छपा था। ख़बर लिखने वाले ने वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों और आमजनों की संवेदनहीनता को खूब कोसा। एक अस्पताल के सामने नवजात बच्ची को फेंक दिया गया। वहाँ से गुज़रने वाले किसी भी शख्स ने उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। फोटोग्राफर ने हर प्रकार से उसकी तस्वीरें ली। सड़क पर उसका पड़े रहने से लेकर कुत्तों का उसे नोंचकर खाने तक की तस्वीरें।
पर सवाल यह है की तस्वीरें खींचकर दूसरों को कोसने वाले फोटोग्राफर की इंसानियत उस समय कहाँ चली गयी थी, जब वह सड़क किनारे पड़ी थी। वह चाहता तो बच्ची को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकता था, जिससे शायद नवजात बच्ची कुत्तों का भोजन बनने से बच जाती। लेकिन यहाँ उसकी प्राथमिकता तस्वीरें खींचकर पुलिस और प्रशासन की लापरवाही दिखाना था ना कि उस मरती हुई बच्ची की जान बचाना। क्या होता अगर वह तस्वीर ना लेता, बस इतना कि अगले दिन यह ख़बर ना छपती, लेकिन अपनों द्वारा ठुकराई गयी वह नन्ही जान तो बच जाती। यदि फोटोग्राफर चाहता तो एक ज़िम्मेदार नागरिक का फ़र्ज़ निभाते हुए पुलिस में इसके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज़ करवा सकता था, लेकिन वह भी मात्र एक मूकदर्शक बन तस्वीरें ही लेता रहा।
क्या पत्रकारों का फ़र्ज़ सिर्फ़ ख़बर छापने तक ही सीमित है। बात जब इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने की आती है तो क्यों ये दूसरों को कोसते नज़र आते है। ज़रुरत पड़ने पर ख़ुद आगे आकर ग़लत होने से रोकते क्यों नहीं??? मेरी उस फोटोग्राफर या अख़बार से जुड़े किसी भी शख्स से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। पर तस्वीर पे नज़र पड़ते ही पहली बात मन में यही आई कि वह चाहता तो बच्ची को कुत्तों के मुहं में जाने से बचा सकता था। वह चाहता तो बच्ची इस दुनिया में साँसे ले सकती थी। वह चाहता तो उसकी जान बच सकती थी। अगर वह चाहता तो….
