रविवार, 16 फ़रवरी 2014

एक नई, मैं


निकल पड़ी हूँ आज,
खुद से खुद को मिलाने
धुंधली होती तस्वीर को,
एक बार फिर से उभारने
अकेली राहों में चलते हुए
खुद से कुछ पल चुराने...
साथ किसी का पाने,
की इच्छा लिए बगैर...
चल पड़ी हूँ आज
खुद से ही दोस्ती निभाने...
कोई दोस्त, कोई साथी,
आज रहना चाहती हूँ खुद के साथ
कुछ यादों को मिटाने 
तो कुछ नयी यादें बनाने...
जाने कैसा एहसास है यह 
जो कर रहा है हर किसी से दूर
अपनी ही नाराज़ परछाई को
चल पड़ी हूँ आज मनाने...
खुशियों की सेज पर जिसके निशां हुआ करते थे
ढूढ़ रही हूँ आज, वो रास्ते पुराने 
निकल पड़ी हूँ आज एक नई, मैं को जानने

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

खूबसूरती दिल की...



खूबसूरती कभी शब्दों की मोहताज नहीं होती,
पर उसकी तारीफ़ के लिए भी अल्फाजों की ज़रुरत होती है...
ये नहीं कहती की बेइन्तेहां खूबसूरत हूँ मैं,
पर इस दिल की भी तो कोई औकात होती है...
कोई कह दे जाकर खूबसूरती के सौदागरों से,
खरीदना ही है तो एक दिल खरीद के दिखाओ...
वादा है, जेब खाली हो जाएगी क्यूंकि,
इस दिल की कीमत मर कर भी अनमोल होती है... 

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं


क्यों विदा कर दिया मुझे ब्याह से पहले
छीन ली माँ की गोद जन्म लेने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
राह में फेंक दिया मुझे, 
आँखें खुलने से पहले 
अनजान थी माँ तेरे प्यार से मैं 
क्यों सुला दिया मुझे लोरी सुनाने से पहले
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं
रुसवा कर दिया अपने आँचल से मुझे
क्यूँ कर दी ज़िन्दगी की शाम, सुबह होने से पहले
पालना तेरा बुलाता है मुझे माँ 
क्यों फर्श पर छोड़ दिया मुझे 
चलना सीखने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
प्यार मेरे दिल में भी कम नहीं
एक मौका देकर तो देखती माँ
आंसू तेरा कभी गिरने न देती 
मेहनत तेरी मैं बांट लेती 
अपने पैरों में बंधी पायल की छन-छन से 
घर में रौनक मैं ला देती 
पर तूने माँ ना जन्मा मुझे 
दूर कर दिया खुद से पास आने के पहले
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं 
जीने का एक मौका देकर तो देखती माँ
तेरे आंगन की धूप बन जाती
तो कभी पेड़ की ठंडी छाँव बन बिछ जाती
ना बनती कभी बोझ तुम पर
तेरे बुढ़ापे का सहारा मैं बन जाती
क्यों उजाड़ दी बचपन की बगिया खिलने से पहले 
कसूर सिर्फ इतना था मेरा कि बेटी हूँ मैं.... 
 














शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

उल्लू चालीसा


उल्लू चालीसा..
सहयोगी- मनीष तिवारी
उल्लू बन गए उल्लू बन गए
बाबा जी के ठुल्लू हो गए
उल्लू बनकर उड़ने लग गए
लक्ष्मी जी की सवारी बन गए
उल्लू बनके मौज उड़ावैं
सारे जग को वो भरमावैं
अब धरती पे टिकते नहीं पांव
जब से इनके पंख लग गए
उल्लू बन गए उल्लू बन गए
उल्लू बनकर उल्लू हो गए
बाबा जी के ठुल्लू हो गए
लक्ष्मी-लक्ष्मी करें पुकारा
जो कोई आवे, जो कोई जावे
सब पर कृपा इनकी होवे
टुकु टुकुर ये करें निहारा
आँखे बड़ी करके बोले
उल्लू बन गए उल्लू बन गए
बाबा जी के ठुल्लू हो गए
धन की लालसा जिसको होवे
उल्लू बनके पेड़ा खावे
सारा माल यहीं पचाते
जो कोई बनता सयाना मुर्गा
उसको दाना यहीं चुगाते
चाणक्य बुद्धि ये लगाते
सारी लक्ष्मी घर ले जाते
उल्लू से जो बैर हैं लेते
लक्ष्मी जी से हाथ हैं धोते
सुबह शाम करो इनका ध्यान
बन जावेंगे बिगड़े काम
जो न इनका ध्यान करते
रह जाते वे हाथ मलते
दिन में फुर्र रात को गाते
उल्लू बन गए उल्लू बन गए
बाबा जी के ठुल्लू हो गए....