रविवार, 3 मार्च 2019

खुद से रूठा मन

खुद से रूठी रहती हूं मैं
न जाने किस बात पे
आजकल वश नहीं चलता मेरा
मेरे ही जज़्बातों पे
अजीब सी चुभन लिए घूमती हूं
जो लगती है सीधा दिल पे
आजकल खुद पर नाराज़ रहती हूं
न जाने किस बात पे...
बातें एक नहीं हज़ारों चलती हैं
मेरे दिल और दिमाग में
न जाने क्या सोचने लगती हूं
आजकल हर बात पे
खुश दिखना मजबूरी है मेरी
क्योंकि खुशी है उसकी दांव पे
खुद से ही लड़ती रहती हूं मैं
न जाने किस बात पे...
न जाने किस बात पे...

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

प्यार को बेड़ियों में नहीं बांधा जा सकता

कहते हैं अगर आपका प्यार आपसे दूर जाना चाहे तो उसे जाने दो, अगर वो वापस आता है तो आपका है और अगर नहीं आता तो वो आपका कभी था ही नहीं। मैंने भी अपने प्यार को उस समय आज़ाद कर दिया जब उसने मुझसे दूर जाने की बात कही। मगर मैं उसके वापस आने की दुआ नहीं करता क्योंकि सभी को अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने का पूरा हक़ है। मेरा नाम सौरभ है और मैं भोपाल का रहने वाला हूं। ये कहानी मेरे पहले प्यार की है। वो प्यार जो कभी मेरा था ही नहीं। मुझसे दूर जाना उसका फैसला था। मगर उसके फैसले की इज्जत करना मेरा फैसला था।
हमारी मुलाकात 9 साल पहले एक स्कूल में हुई थी। एमबीए के एंट्रेंस टेस्ट के लिए हम दोनों का सेंटर एक ही स्कूल में पड़ा था और इत्तेफ़ाक़ से हमारी सीट्स भी अगल- बगल ही थी। उस दिन रीजनिंग टेस्ट में मैंने उसकी काफी मदद की और यहीं से हुई हमारी दोस्ती की शुरुआत। वो रीजनिंग में कमज़ोर थी इसलिए उसने मुझसे रीजनिंग पढ़ाने की रिक्वेस्ट की, जिसे मैंने मान लिया। अगले दिन से मैंने उसे रीजनिंग में हेल्प करना शुरू कर दिया और उसकी सभी ट्रिक्स उसे सिखाने लगा।
कुछ महीनों बाद हम दोनों ने पुणे के एमबीए कॉलेज का एंट्रेंस टेस्ट दिया और उसमें पास हो गए। ये पहला मौका था जब हम दोनों घर वालों से दूर एक ही शहर में और एक ही कॉलेज में पढ़ रहे थे। उसका हर छोटी- छोटी बात पर मुझपर डिपेंड होना मुझे अच्छा लगने लगा। गर्ल्स हॉस्टल में छुप- छुप कर उससे मिलने जाना, बाकी लड़कों की नजर से उसको बचा कर रखना और उसकी हर ख्वाहिश पूरा करना मुझे बहुत लगता। हां, उसे गुस्सा थोड़ा जल्दी आ जाता था मगर उसके मासूम चेहरे के आगे उसका गुस्सा भी मुझे प्यारा लगता और कई बार अपनी गलती न होने पर भी मैं उससे माफ़ी मांग लेता।
धीरे- धीरे हमें एहसास होने लगा कि हम एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं। कॉलेज के वो दो साल हमारे प्यार में कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। हम दोनों को नौकरी मिलते ही मैंने अपने घर में उसके बारे में सबको बता दिया। मुझे लगा मेरे घर वाले नाराज़ होंगे मगर उम्मीद से उलट जाकर मेरे घर वालों ने हमारे प्यार के लिए हामी भर दी। मगर शादी करने से पहले हमें अपने- अपने करियर में फोकस करने की हिदायत भी दे दी। करियर बनाने की भागदौड़ में कब कई साल निकल गए पता ही नहीं चला। हमारा रिश्ता अब लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप का बन चुका था क्योंकि मैं जॉब के लिए दिल्ली आ गया और वो पुणे में ही जॉब करने लगी।

हमारे शहर की दूरी धीरे- धीरे हमारे रिश्ते की भी दूरी बनने लगी। हम कभी रोज़ मिला करते थे मगर अब साल में सिर्फ दो- तीन बार ही मिलना हो पाता। फ़ोन पर भी अब काम ही हमारी बातें हो पाती और जब होती तो वो किसी न किसी लड़ाई पर जाकर ही ख़त्म होतीं। हम दोनों हमारे रिश्ते के बीच आई इस दूरी को महसूस कर पा रहे थे मगर इस बात को स्वीकारना हम दोनों के लिए आसान नहीं था क्योंकि हम अपने रिश्ते को कई साल दे चुके थे।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब हम अपने प्यार की 9 वीं एनिवर्सरी मनाने के लिए मिले थे। मैं अक्सर उससे मिलने पुणे जाता, ऐसा पहली बार था जब वो मुझसे मिलने दिल्ली आई थी। मैं उससे मिलने की बात पर बहुत खुश था। मगर मुझे क्या पता था ये हमारी आखिरी मुलाक़ात होगी। दरअसल हमारे घर वाले अब शादी करने के लिए बोलने लगे थे। मगर न तो वो पुणे छोड़ने के लिए राज़ी थी और न मैं दिल्ली। मगर इस मुलाक़ात में मुझे उम्मीद थी कि हमारी प्रॉब्लम का कोई न कोई सॉल्यूशन ज़रूर निकलेगा। रेस्टोरेंट पहुंचते ही जैसे एक नई लड़की से मुलाक़ात हुई। ये वो अनन्या नहीं थी जिसे मैं बरसों से जानता था, प्यार करता था। मुझसे इतने समय बाद मिलने पर भी वो ज्यादा खुश नजर नहीं आ रही थी।

मैं उससे बहुत सारी बातें करना चाहता था। मगर उससे पहले उसने अपने मन की बात मेरे सामने रख दी। उसने कहा कि उसके घरवाले अब उसपर शादी का दबाव बना रहे हैं मगर तुम्हारी सैलरी उन्हें ज़िम्मेदारी उठाने के हिसाब से कम लगती है। इसलिए वो मुझे तुमसे शादी करने से रोक रहे हैं। मैंने तुरंत उससे पूछा कि मुझे किसी और की परवाह नहीं हैं, सिर्फ इतना बता दो कि इस बारे में तुम क्या सोचती हो। उसने कहा, "मुझे लगता है मेरे घरवाले सही कह रहे हैं, तुम्हारी सैलेरी वाकई बहुत कम है।" उसके जवाब ने मुझे अंदर तक तोड़ कर रख दिया। ऐसा पहली बार था जब मेरा उसे रोकने या मनाने का मन नहीं हुआ। वो मेरी आंखों के सामने मुझसे दूर जा रही थी मगर मैंने उसे नहीं रोका, उसे जाने दिया अपनी ज़िन्दगी से दूर... बहुत दूर।

उस मुलाक़ात को साल भर बीत चुका है, और उसकी शादी अभी तक कहीं नहीं हुई है। मगर आज भी जब आंखें बंद करके उसके बारे में सोचता हूं तो सिर्फ यही दुआ करता हूं कि वो जहां भी रहे खुश रहे।   

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

वो कच्ची उम्र का पक्का प्यार

यूं तो प्यार के कई नाम हैं। कोई इसे इश्क कहता है तो कोई मोहब्बत, किसी के लिए ये इबादत है तो किसी के लिए उसकी पूरी दुनिया। लोग कहतें है कि प्यार दर्द देता है, उससे दूरी ही भली। मगर मैं कहती हूं कि प्यार तो हर मर्ज की दवा है। जब हमारी जिन्दगी में प्यार होता है उस समय हम सबसे ज्यादा खुश होते है मगर जब वही प्यार हमारे पास नहीं होता तो हमें टूटने का, बिखरने का, दुखी होने का और दर्द का एहसास होता है। फिर हम दर्द देने का इल्जाम प्यार के ऊपर कैसे लगा सकते हैं। प्यार तो बस प्यार होता है।
जो कभी किसी शायर की शायरी बन जाता है तो कभी ठंडी हवा का झोंका बन जाता है। कभी बारिश में भीगी हुई नरम घास बन जाता है तो कभी चाय की गरम प्याली बन जाता है। ये प्यार है, इसे परिभाषित करना इतना भी आसान नहीं, जितना लोग समझते हैं। इसको समझ पाना भी काफी मुश्किल है। खासतौर पर जब वो पहला प्यार हो, पहली बार किसी से नजरें मिली हों, पहली बार किसी के लिए दिल ज़ोरों से धड़का हो, पहली बार जिसको मिलकर बार-बार मिलने का दिल करे। बहुत मासूम होता है ये प्यार, कच्ची उम्र का पक्का प्यार। मेरा नाम अंकिता भार्गव है। ये कहानी मेरी कच्ची उम्र के उस पहले प्यार की है जिसकी खुशबू आज भी मेरी यादों में महक उठती है।
बात उस समय की है जब मैं मसूरी के एक स्कूल में 12वीं क्लास पढ़ाई कर रही थी। वो हमारे फेयरवेल का दिन था जब नवीन ने पहली बार मुझसे खुद आकर बात की और हाय बोला। मेरे लिए ये किसी सपने से काम नहीं था। नवीन मेरा क्लासमेट था और बैकबेंचर भी। मैं पिछले 2 साल से उसे पसंद करती थी। वो हमेशा क्लास में टीचर्स को परेशान करता था। पढ़ाई करते तो शायद ही कभी मैंने उसको देखा हो। मगर उसके बाद भी वो क्लास में हमेशा सेकेंड पोजीशन में आता। क्योंकि फर्स्ट पोजीशन की गद्दी पर तो सिर्फ मेरा ही राज था। मैं एकदम पढ़ाकू किस्म की लड़की थी, चश्मिश बुलाते थे सब क्लास में मुझे। नवीन की शैतानियां, उसकी मस्तीखोरी मुझे हमेशा से ही बहुत पसंद आती। मगर वो तो इन सब से अनजान सिर्फ अपनी धुन में मस्त रहता था। फेयरवेल के दिन जब उसने मुझसे बात की तो मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दूं। थोड़ा हकलाते हुए मैंने भी उसे हाय कहा और यहींं से शुरू हुई हमारी दोस्ती।
कुछ समय बाद हम दोनों को ही दिल्ली के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया। घर और दोस्तों से दूर सिर्फ नवीन ही था, जिसे मैं जानती थी और जिसपर मैं विश्वास भी कर सकती थी। मगर दिल्ली आते ही न जाने नवीन को क्या हो गया। मैं उससे जितना बात करने की कोशिश करती, वो मुझसे उतना ही ज्यादा दूर भागता। यहां उसका एक नया ग्रुप बन गया था, जिसमें मेरे लिए कोई जगह नहीं थी। उसे शायद मेरे साथ रहने में शर्म महसूस होती थी। क्योंकि मैं अभी भी वही चश्मिश और पढ़ाकू टाइप की लड़की थी। मैं अक्सर दूर से उसे लोगों के साथ हंसी मज़ाक और मस्ती करते देखती मगर मेरे पास आते ही न जाने उसे क्या हो जाता। मैंने सोच लिया था कि इस बारे में नवीन से बात करके ही रहूंगी।
अगली रोज मैंने उसका हाथ पकड़ा और खींच कर उसे कैंटीन की तरफ ले गई। मैंने उससे पुछा कि क्यों कर रहा है वो मेरे साथ ऐसा। क्यों बात नहीं करता, क्यों कटा-कटा सा रहता है मुझसे। इन सवालों के बदले मिले जवाब ने मुझे जैसे तोड़ कर ही रख दिया। उसने मुझसे कहा कि कॉलेज में सभी पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते हैं, मुझे चश्मिश और बहन जी बुलाते है। ऐसे में अगर उसने मुझसे बात की तो कॉलेज की कोई लड़की नवीन को घास नहीं डालेगी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं किससे बात कर रहीं हूं। उस नवीन से जो स्कूल में मासूम शरारतें किया करता था या फिर इस नवीन से मुझसे बात करने में भी शर्म महसूस करता है। मैंने उसी वक़्त फैसला कर लिया कि अब चाहे जो भी हो मैं नवीन से कभी बात नहीं करूंगी।
उस दिन के बाद से ही मैंने नवीन को अवॉयड कर पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया। इंजीनियरिंग के पहले साल का रिजल्ट आने पर पता चला कि मैंने टॉप किया है और नवीन का नाम लिस्ट में सबसे आखिरी था। वो मुझसे अपनी नज़रें ही नहीं मिला पा रहा था। ख़राब रिजल्ट की वजह से जो लड़कियां उसके साथ घूमती थीं, उन्होंने भी उससे बात करना बंद कर दिया था। मगर अब मेरा अपना ग्रुप बन चुका था। कॉलेज के लड़के मुझसे दोस्ती के बहाने नोट्स लिया करते। नवीन अकेला पड़ चुका था। एक दिन मौका देखकर उसने मुझसे बात करनी चाही, मगर इस बार मैंने उसे अवॉयड कर दिया और अपने नए दोस्तों में मस्त हो गई। मन ही मन मुझे उसके लिए बुरा फील हो रहा था, लेकिन जो उसने मेरे साथ किया उसे भूल पाना भी मेरे लिए मुश्किल था। समय बीतता गया और कॉलेज का दूसरा साल भी निकल गया। नवीन का रिजल्ट अब और भी खराब होने लगा था।
एक दिन अचानक उसने आकर मुझसे अपने किए की माफी मांगी। वो बस रोए जा रहा था। उसकी आंखों में पछतावा साफ़ नजर आ रहा था। उसने मुझसे कहा कि दिल्ली आकर वो इस चकाचौंध में भूल गया था कि सुंदरता सादगी में ही होती है और दोस्ती दिल से निभाई जाती है, दिखावे से नहीं। उसे अपनी गलतियों का एहसास था। वो चाहता था कि मैं सबकुछ भूलकर फिर से उसकी दोस्त बन जाऊं। मैं अभी भी मन ही मन उससे प्यार करती थी इसलिए मैंने उसे माफ कर दिया। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर अगले दो साल तक पढ़ाई में बहुत मेहनत की और फाइनल ईयर में अच्छे नंबरों के साथ इंजीनियरिंग पूरी की। जिसके बाद हम दोनों को ही अलग-अलग कंपनी में जाॅब मिल गई।
आज 5 साल बाद हम दोनों अपनी-अपनी जिन्दगी में खुश हैं और बहुत अच्छे दोस्त भी हैं। मैं कभी उससे अपने दिल की बात नहीं कह पाई। मगर तसल्ली इस बात की है कि मुझे दोस्त के रूप में ही सही, लेकिन पुराना नवीन वापस मिल गया था। वो कभी नहीं समझ पाया कि मेरे दिल में उसके लिए क्या है। इस कहानी के जरिए मैं अपने दिल की बात नवीन को बताना चाहती हूं और उससे अपने प्यार का इजहार करना चाहती हूं। इस उम्मीद के साथ कि शायद वो मेरे जज्बातों को समझे और मेरे प्यार को अपनाकर मुझे भी अपना बना ले।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

प्यार में शर्तें और मजबूरी नहीं, सिर्फ प्यार होता है

सोचती हूं जब अपनी ही जिंदगी को शब्दों में उतारने की बारी आती है तो कितनी हिम्मत की जरूरत पड़ती है। कितना कुछ बीता हुआ आंखों के सामने आ जाता है। वो अल्हडपन, वो बेफिक्री, वो दिल में कुछ बनने का जूनून...ऐसी ही तो थी मैं 11 साल पहले तक। आज ऐसा लगता है जैसे इतने सालों का सफर एक लम्हे में सिमट आया है। पहले प्यार को मैंने सिर्फ दूसरों की जुबानी सुना ही था, कभी खुद महसूस नहीं किया था। यही सोचती थी कि पहले कुछ बन जाऊं, अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं उसके बाद प्यार के बारे में सोचूंगी। मम्मी- पापा ने हमेशा जरूरतें पूरी कीं लेकिन शौक खुद की कमाई से ही पूरे किये। मेरा नाम प्रिया है और मैं आपको बताने जा रही हूं अपने पहले प्यार की कहानी...
मैं एक प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी कर रही थी, जब अमर मेरी जिंदगी में आया। वो मेरा ऑफिस कुलीग था। अपने डिपार्टमेंट में 5 लड़कों के बीच एक अकेली लड़की थी मैं, इसलिए सभी बहुत केयर करते थे मेरी। मगर उनकी केयर को कभी मैंने अपने काम के बीच नहीं आने दिया और हमेशा अपना बेस्ट देने की कोशिश की। मेरा और अमर का अक्सर फील्ड वर्क के लिए साथ बाहर जाना होता। धीरे- धीरे काम के बीच हम दोनों में कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला। उसका मेरी केयर करना, मुझपर हक जताना...ये मुझे बहुत अच्छा लगता।
वो मुझे कभी ऑफिस में किसी और लड़के से बात नहीं करने देता, ये कहकर कि उसकी नीयत ठीक नहीं है...यहां तक कि मेरे बेस्ट फ्रेंड से भी मेरा बात करना उसे पसंद नहीं था। मैं भी उसकी बातों में आकर ये सोचती कि ये उसका मेरे लिए प्यार और कन्सर्न है। धीरे- धीरे उसने मुझे बदलना शुरू कर दिया जिसकी शुरुआत हुई मेरे कपड़ों से। वो हमेशा मुझे ऑफिस सूट पहनकर आने को कहता, अगर जीन्स- टॉप पहना है तो साथ में स्टोल जरूरी है, कट स्लीव्स और कैप्री नहीं पहनने हैं, स्किन टाइट टॉप तो बिलकुल नहीं। मेरे लिए ये सब करना बहुत मुश्किल था। मैं एक ओपन माइंडेड फैमिली से थी और अमर एक कन्जर्वेटिव फैमिली से, पर फिर भी मुझे ना जाने क्या हो गया था। विरोध करने के बजाए उस प्यार में मुझे सब सही लगने लगा था। मैं ऐसी बिल्कुल नहीं थी।
कुछ दिनों के बाद उसका ट्रांसफर बनारस हो गया। वहां जाते ही पता नहीं उसे क्या हुआ, उसने मुझसे बात करना कम कर दिया। मैं बेचैन होने लगी थी, हर पल यही सोचती कि वो मुझसे बात क्यों नहीं कर रहा है। किस्मत से एक महीने बाद मेरा ट्रांसफर भी उसी शहर में हो गया। जब मैं वहां पहुंची तो मेरा सामना एक अलग ही अमर से हुआ। उसने मुझसे साफ- साफ कह दिया कि यहां मुझसे बात मत करना क्योंकि सबको लगता है कि मैंने तुम्हारा ट्रांसफर अपने पास करवाया है। उस अनजान शहर में अमर भी मेरे साथ अनजानों जैसा व्यवहार करता। उसके इस व्यवहार ने मुझे तोड़ना शुरू कर दिया।
वो दिन मुझे आज भी याद है जब एक बार ऑफिस में काम करते समय काफी देर हो गई थी। मेरे एक कुलीग ने मुझे आधे रास्ते तक छोड़ देने की रिक्वेस्ट की, जिसे मैंने मान लिया। हम बाइक से जा रहे थे तो रास्ते में हमारा एक्सीडेंट हो गया। मुझे हाथ में फ्रैक्चर हुआ और मेरे कुलीग को भी कुछ चोटें आ गईं। अगले दिन जब अमर को इस बात का पता चला तो मेरा हाल पूछने के बजाए, उसने मुझसे सिर्फ एक सवाल किया, "तुम जब गिरी तो तुम्हें उठाने के लिए उसने तुम्हें छुआ भी होगा"।
अमर के इस सवाल से मैं हैरान रह गई और इस बात ने अन्दर तक तोड़ कर रख दिया। मैंने सोचा कि जिस लड़के के लिए मैंने खुद को ऊपर से नीचे तक बदल डाला, आज वो मुझसे ऐसा सवाल कर रहा है। मैंने भी उसे 'हां' में जवाब दे दिया जिसके बाद उसने मुझसे यह रिश्ता खत्म करने के लिए बोल दिया। मैंने भी सोच लिया था कि अब जिंदगी में कभी उसकी तरफ मुड़ कर नहीं देखूंगी। लगभग 2 साल तक मैं डिप्रेशन में रही, जिसके बारे में मैंने अपने घर में किसी को पता भी नहीं लगने दिया। प्यार के नाम से भी नफरत करने लगी थी मैं। वो मेरा पहला प्यार था, जिसने इतनी बेदर्दी से मेरे प्यार को ठुकरा दिया, जैसे वो मुझसे दूर जाने का कोई बहाना ढूंढ़ रहा हो।
इस बीच मेरे दोस्तों ने मुझे उसकी यादों से बाहर लाने में बहुत मदद की और मैं अपनी नौकरी में बिजी हो गई। मगर मेरे कानों में अब भी अमर के वो आखिरी शब्द हमेशा गूंजते रहते। 3 साल बाद मेरे लिए शादी का एक रिश्ता आया। लड़का दिल्ली में अपनी फैमिली के साथ रहता था। उनका नाम अभिषेक था। एक साल के कोर्टशिप पीरियड के बाद मेरी शादी अभिषेक से हो गई। अपने पिछले रिश्ते की कडुवाहट में अक्सर मैं यही सोचती कि इस बार कुछ हुआ तो मैं अपने पति के खिलाफ भी खड़ी हो जाऊंगी लेकिन खुद को नहीं बदलूंगी।
मगर इस बार मुझे ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी। अभिषेक बहुत ही सुलझे हुए, स्वीट से इंसान हैं। वो मुझे कभी किसी बात के लिए नहीं टोकते। न लड़कों से बात करने पर, न अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर और न दोस्तों के साथ बाहर घूमने जाने पर। वो हमेशा मुझसे कहते हैं कि मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, तुम कभी कुछ गलत नहीं करोगी और मैं तुम्हारी जिंदगी में दखल देने वाला कौन होता हूं। तुम्हें शादी करके लाया हूं, खरीद कर नहीं जो तुम पर हुकुम चलाऊं। अभिषेक के प्यार और विश्वास ने मेरे मन की कडुवाहट को प्यार में बदल दिया। वो अक्सर मेरे साथ घर के काम, खाना बनवाने में मेरी मदद और जरूरत पड़ने पर मुझे एक बच्चे की तरह पैम्पर भी करते हैं।
अभिषेक के साथ से मैंने जाना कि अमर से मेरा कभी प्यार का रिश्ता था ही नहीं। मैंने अमर से सिर्फ प्यार किया था लेकिन प्यार को निभाना मुझे अभिषेक ने सिखाया। उनके साथ मैं बहुत आजाद महसूस करती हूं। आज हमारी शादी को 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है और अभी भी हम दोनों पति- पत्नी कम और लिव- इन- पार्टनर्स की तरह ज्यादा रहते हैं। सही मायने में मेरा पहला प्यार अभिषेक ही हैं। जिन्होंने मुझे कभी बदलने की कोशिश नहीं की बल्कि मेरी हर अच्छी- बुरी आदत के साथ पूरे दिल से मुझे अपनाया। यही तो प्यार होता है न... जहां कोई शर्त और कोई मजबूरी नहीं होती, सिर्फ प्यार होता है।
कहानी कैसी लगी... बताइएगा ज़रूर...





मंगलवार, 3 जुलाई 2018

मेरे यादों का शहर...


मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं 
ठहरी है जहां निगाहें मेरी 
उस समंदर से मिल कर आई हूं 
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...
मिलती थी हर रोज़ खुशियां जहां 

हाथों में डाले हाथ हम गुज़रे थे जहां
उस रेत पर अपने निशान छोड़ कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

तस्वीरों का जहां हिसाब नहीं हुआ
नज़ारों का जहां कभी अंत नहीं हुआ
उन वादियों से मिल कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

शरारतों ने जहां कभी इजाज़त नहीं मांगी
मोहब्बत ने जहां कभी, वक़्त की मोहलत नहीं मांगी
उन गलियों से गुज़र कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

बाहें खोल कर जहां इज़हारे इश्क़ किया
तेरे साथ जहां हर पल को जिया
मुस्कुराहटों से भरी उन शामों से मिल कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

डूबता हैं जहां सूरज नशे में चूर होकर
चांद की रौशनी में खुद को खोकर
शाम की उस चौखट को छू कर आई हूं
मैं यादों के उस शहर से अभी- अभी होकर आई हूं...

बुधवार, 27 जून 2018

लघु कथा- तुम्हें ज़रूरत नहीं किसी निशानी की


मानव (झिझकते हुए): सुनो, क्या मैं ये अंगूठी उतार दूँ?

अपेक्षा: लेकिन ये तो हमारी सगाई की अंगूठी है, इसे क्यों उतार रहे?

मानव: देखो न, मेरी उंगली में अंगूठी का निशान बन गया है। मैं कुछ दिन के लिए इसे नहीं पहन सकता और वैसे भी मुझे आदत नहीं है ये सब पहनने की, इसीलिए उतार रहा हूँ, तुम संभाल कर रख दो।

अपेक्षा (थोड़ा मुस्कुराते हुए): ह्म्म्म... ये बिछिया देख रहे हो मेरे पैरों में, जब भी जूती या सैंडल पहनने की कोशिश करती हूं... ये गढ़ती है उंगली में, बहुत दर्द होता है। इस वजह से मैंने अपनी पसंद की फुटवियर पहननी ही बंद कर दी। अब सिर्फ वही चप्पल खरीदती हूं जिसमें उंगलियां आगे से खुली रहती हैं...

...अच्छा ये छोड़ो, मेरा मंगलसूत्र देखो, पता है गर्मियों में कई बार पसीना आने से इसकी वजह से मुझे दाने हो जाते हैं। फिर भी मैं इसे उतारती नहीं...

...और ये कांच की चूड़ियां, ये तो सबसे ज्यादा नटखट हैं, काम करते-करते खुद तो टूटती ही हैं, साथ में मेरे हाथों में चोट भी दे जाती है...

...उफ्फ ये कान की बाली, सोते समय बहुत तंग करती है, कभी-कभी तो कान का छेद पका भी देती है।
मुझे भी आदत नहीं थी ये सब रोज़ पहन कर रहने की, फिर भी पहनती हूं।
और गलती से कभी इनमें से कुछ उतार दूं या पहनना भूल जाऊं तो तुम्हारी मां यानी मेरी सासू मां टोक देती हैं और साथ में सुहाग की निशानियों पर दस बातें भी सुना देती हैं...

...पर तुम्हें कोई नहीं टोकेगा और ना बातें सुनाएगा। क्योंकि तुम्हें किसी निशानी की ज़रूरत नहीं....लाओ रिंग मुझे दो, मैं संभाल कर रख देती हूं।

रविवार, 4 मार्च 2018

शादी के बाद भला क्यूँ बदलूं मैं अपना नाम ???



सुप्रिया नितिन सिन्हा... मैंने शादी के बाद फेसबुक पर अपना नाम बदलकर, ये नाम रखने की कभी नहीं सोची. हालाँकि फेसबुक पर मैंने अक्सर ऐसी बहुत सी लड़कियों को देखा है जो शादी होते ही अपने नाम के आगे अपने पति का नाम जोड़ लेती है. शायद अपना प्यार जताने का ये उनका एक तरीका हो या फिर अपने पति का नाम अपने नाम के आगे जोड़ कर उन्हें शान महसूस होती हो. या फिर वो इस वर्चुअल दुनिया को यह बताना चाहती हों की 'देख लो अब मेरी शादी हो गयी है, अब नो चांस'... खैर, एक तरह से ये उनकी पसंद का मामला है, वो जो भी चाहे करें अपने नाम के साथ.
 
मुझे आज भी याद है, स्कूल में मेरी एक सहेली ने बताया था की उसके यहाँ एक रिवाज़ है. जिसमें शादी होते ही ससुराल वाले लड़की का दूसरा नाम रख देते है और आगे की पूरी ज़िन्दगी वो उसी नाम से जानी जाती है. उस समय भी मझे ये बात कुछ ख़ास समझ नहीं आई थी. मैं सोचती थी कि आखिर जब माता-पिता ने अपनी बेटी का एक प्यारा सा नाम रख दिया है तो उसे बदलना क्यों? कहीं न कहीं उसी समय मेरे बाल मन ने यह तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपना नाम कभी भी नहीं बदलूंगी. 

दादी-नानी से अक्सर ये कहते सुना है कि लड़कियां पहले अपने पिता के नाम से जानी जाती है, शादी के बाद अपने पति के नाम से और बच्चे होने के बाद उनके नाम से. कुल मिलकर बचपन में ही हमें ये बात घुट्टी बना कर पिला दी जाती है कि हमारा अपना कोई अस्तित्व नहीं होता. मगर अब समय बदल गया है. अब हर दूसरी लड़की बड़े होने पर सफ़ेद घोड़े पर सवार राजकुमार के सपने नहीं देखती बल्कि अपने करियर को एक बेहतर दिशा में ले जाने के सपने देखती है. आज हर लड़की का सपना सिर्फ शादी करके घर बसना नहीं होता. बल्कि उसके साथ-साथ अपने करियर को एक नई उड़ान देना भी होता है. वो इतनी सक्षम होती है कि अपना नाम खुद बना सके और खुद अपनी पहचान कायम रख सके.

तो फिर क्यों अपना नाम बदलें. शादी से पहले हमने जिस नाम से अपनी पहचान बनाई है उसी नाम को क्यूँ हम शादी के बाद बदल दें. मुझे मेरा नाम बहुत पसंद है और मैं उसे फेसबुक या फिर अपने किसी डाक्यूमेंट्स में नहीं बदलना चाहती. ऐसा नहीं है कि मुझे दुनिया के बनाये हुए उसूलों से उल्टा चलने की आदत है. बस मेरी सोच इस मामले में अलग है.

लोग मुझे पहले भी सुप्रिया श्रीवास्तव के नाम से ही जानते थे और मैं चाहती हूँ की मेरी शादी के बाद भी वो मुझे इसी नाम से जाने न की किसी और नाम से. मैं खुशकिस्मत हूँ कि मेरे इस फैसले में मेरे पति ने मेरा पूरा साथ दिया. वो खुद नहीं चाहते कि मैं उनके नाम से जानी जाऊं बल्कि वो मेरी अपनी एक इंडिविजुअल पहचान बनते देखना चाहते है. वो बहुत खुश होते है जब कोई उनसे मेरे ब्लॉग की या मेरी राइटिंग की तारीफ़ करता है. आखिर मेरे हर ब्लॉग के सबसे बड़े क्रिटिक भी तो वही हैं.

ये मेरा नाम है. वो नाम जिससे बचपन में मुझे स्कूल में एडमिशन मिला. वो नाम जिससे मैंने अपना कॉलेज पूरा किया, वो नाम जो मेरी डिग्रियों से लेकर मेरे आधार कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस तक में है, वो नाम जिसे मैंने अपनी पहली नौकरी में भरा था. फेसबुक हो, जीमेल हो, लिंक्ड इन हो, मेरा ब्लॉग हो या फिर कुछ और. मैं हर जगह अपने नाम का इस्तेमाल करना पसंद करती हूँ. आखिर मेरा नाम ही तो मेरी पहचान है तो फिर शादी के बाद भला क्यूँ बदलूं मैं अपना नाम ???